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महिलाओं की कम हिस्सेदारी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बार काउंसिलों में 30 फीसदी सीटें अनिवार्य

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✍🏻 डिजिटल न्यूज डेस्क, नई दिल्ली | भारत के न्यायिक इतिहास में एक बड़ा और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देशभर की सभी राज्य बार काउंसिलों में महिलाओं के लिए न्यूनतम 30 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य कर दिया है। कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) को निर्देश दिया कि वह अपनी मौजूदा नियमावली को इसी भावना के साथ लागू करे और इसे संशोधित मानते हुए महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करे।

मुख्य न्यायाधीश डीवाई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बघ्ची की पीठ ने कहा कि यह कदम संविधानिक मूल्यों, लैंगिक समानता और हालिया विधायी सुधारों के अनुरूप है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आरक्षण केवल सदस्यता तक सीमित नहीं होगा, बल्कि राज्य बार काउंसिलों के पदाधिकारियों पर भी लागू होगा।

पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “जब महिलाओं की संख्या पेशे में लगातार बढ़ रही है, तब बार काउंसिलों में उनकी अनुपस्थिति असंतुलन को दर्शाती है। मौजूदा ढांचे की व्याख्या इस प्रकार की जाए कि प्रत्येक राज्य बार काउंसिल में कम से कम 30 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए सुनिश्चित हों।”

यह महत्वपूर्ण आदेश सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ताओं योगमाया एमजी और शहला चौधरी द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया। याचिकाओं में बताया गया कि देशभर की 18 राज्य बार काउंसिलों के 441 निर्वाचित सदस्यों में मात्र 9 महिलाएं हैं यानी केवल 2.04 प्रतिशत। वहीं 1961 में गठन के बाद से बीसीआई में एक भी महिला सदस्य नहीं रही, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के उल्लंघन की ओर इशारा करता है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि 2026 में प्रस्तावित पांच चरणों के बार काउंसिल चुनाव बिना किसी महिला आरक्षण के होने वाले थे, जिससे महिलाओं का प्रतिनिधित्व अगले पांच वर्षों के लिए भी लगभग असंभव हो जाता।

सुप्रीम कोर्ट ने बीसीआई को 8 दिसंबर तक अनुपालन रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है। अदालत अगले सुनवाई में बताए गए कदमों की समीक्षा करेगी।

 


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