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सरकार के भीतर से अंदरूनी गवाहियां: क्या राजनीतिक जीत के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था हार रही है?

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‘मार्कशीट’ चमकीली, पर ‘इकोनॉमी’ फेल: जब अंदरूनी सिपहसालारों ने ही खोल दी सरकारी दावों की पोल

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | किसी भी जीवंत लोकतंत्र में सरकार के लिए सबसे असहज करने वाली चेतावनी विपक्ष से नहीं, बल्कि व्यवस्था के भीतर से आती है- उन चेहरों से, जिन्होंने नीतियों को आकार दिया और संस्थागत रीढ़ को संभाला। भारत आज ऐसे ही एक मोड़ पर है।

सरकारी विज्ञापनों में भारत दुनिया की सबसे चमकीली अर्थव्यवस्था है। लेकिन अर्थशास्त्री जानते हैं कि आंकड़ों का मेकअप कितना भी अच्छा हो, गरीबी और बेरोजगारी का चेहरा छिप नहीं पाता। पिछले एक दशक में देश के सर्वोच्च आर्थिक पदों पर रहे पूर्व सिपहसालारों ने आर्थिक दिशा, आंकड़ों की साख और संस्थागत स्वायत्तता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

इस फेहरिस्त में अरविंद सुब्रमण्यन (पूर्व CEA), रघुराम राजन व उर्जित पटेल (पूर्व RBI गवर्नर), विरल आचार्य (पूर्व डिप्टी गवर्नर), सुरजीत भल्ला (पूर्व सदस्य, PM-EAC) और अरविंद पनगड़िया (पूर्व उपाध्यक्ष, नीति आयोग) शामिल हैं। ये किसी एक विचारधारा के नहीं हैं, न ही इनका कोई राजनीतिक एजेंडा है। लेकिन इनके सुरों को मिलाकर जो पैटर्न बनता है, उसे सामान्य बयानबाजी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

सवाल यह नहीं कि भारत बढ़ रहा है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विकास का सरकारी नैरेटिव रोजगार, वेतन और घरेलू तनाव की जमीनी हकीकत से मेल खाता है?

विकास का नैरेटिव बनाम आंकड़ों का सच

भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बताया जाता है, लेकिन इसकी गहराई पर सवाल हैं। पूर्व सीईए अरविंद सुब्रमण्यन ने पद छोड़ने के बाद तर्क दिया कि भारत की जीडीपी विकास दर को करीब 2.5% बढ़ाकर आंका गया हो सकता है।

मई 2026 में यह बहस तब और तीखी हो गई जब सरकार समर्थक माने जाने वाले अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने लिखा कि ‘भाजपा चुनाव तो जीत रही है, लेकिन अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर लगातार हार रही है।’ भल्ला के अनुसार, 2014 के बाद से प्रति व्यक्ति डॉलर आय और जीडीपी वृद्धि के मामले में भारत की वैश्विक रैंकिंग “सबसे तेज विकास” के नारे का जश्न मनाने की इजाजत नहीं देती।

यदि देश की 80 करोड़ से अधिक आबादी मुफ्त राशन पर निर्भर है, तो यह वर्षों के कथित तेज विकास के बाद भी आम परिवारों की कमजोर क्रय शक्ति (Purchasing Power) को उजागर करता है। हेडलाइन जीडीपी चमकीली हो सकती है, लेकिन यदि युवाओं में बेरोजगारी चरम पर हो और धन का संकेंद्रण कुछ ही हाथों में हो, तो विकास समावेशी नहीं रह जाता।

नोटबंदी और जीएसटी: अनौपचारिक क्षेत्र को चोट

नवंबर 2016 की नोटबंदी स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा आर्थिक प्रयोग थी। काले धन और भ्रष्टाचार को मिटाने के दावों के विपरीत, आरबीआई की रिपोर्ट ने दिखाया कि लगभग पूरी मुद्रा बैंकिंग प्रणाली में लौट आई। रघुराम राजन ने खुलासा किया कि वे इसके पक्ष में नहीं थे और सरकार को इसकी अल्पकालिक लागतों के प्रति आगाह किया था। पूर्व गवर्नर की चेतावनियों को दरकिनार कर की गई इस ‘बिना एनेस्थीसिया की सर्जरी’ का नतीजा यह हुआ कि 99% से ज्यादा प्रतिबंधित करेंसी वापस बैंकों में आ गई। काला धन तो नहीं मरा, लेकिन दिहाड़ी मजदूर, छोटे व्यापारी और सूक्ष्म उद्योग जरूर वेंटिलेटर पर चले गए। इसका सबसे क्रूर असर नकदी पर निर्भर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, छोटे व्यापारियों और दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ा।

इसके ठीक बाद, बिना किसी संस्थागत तैयारी के ‘एक देश, एक टैक्स’ यानी गुड्स एंd सर्विसेज टैक्स (GST) का ऐसा कानूनी जंजाल थोपा गया कि बड़ी कॉर्पोरेट लॉबी तो टैक्स सलाहकारों के दम पर बच निकली, लेकिन छोटा व्यापारी कागजी कार्रवाई के बोझ तले दबकर दम तोड़ गया।

आरबीआई की स्वायत्तता का संकट

बाजार केंद्रीय बैंकों को उनकी कथित स्वायत्तता से आंकते हैं। मोदी सरकार के कार्यकाल में आरबीआई के भीतर दिखा तनाव संस्थागत साख के लिए झटका था। रघुराम राजन को दूसरा कार्यकाल न मिलना, उर्जित पटेल का कार्यकाल से पहले इस्तीफा और डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य की यह चेतावनी कि “जो सरकारें केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करतीं, उन्हें वित्तीय बाजारों के गुस्से का सामना करना पड़ता है”, एक खतरनाक पैटर्न दिखाते हैं।
जब सरकार की राजकोषीय भूख इतनी बढ़ गई कि उसने आरबीआई के रिजर्व फंड (Surplus) पर ही कब्जा कर लिया, तो संस्थागत स्वतंत्रता का मुखौटा पूरी तरह उतर गया। आरबीआई के विशाल आरक्षित कोष को सरकार को ट्रांसफर किए जाने से यह चिंता और गहरी हो गई कि मौद्रिक संस्थान केवल कागजों पर स्वायत्त रह गए हैं।

गायब होता जनसांख्यिकीय लाभांश और असमानता

भारत की युवा आबादी उसकी ताकत बन सकती थी, लेकिन ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ रिपोर्ट शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी की भयावह तस्वीर पेश करती है। पेपर लीक, लटकी भर्तियां, संविदा (Contractual) नौकरियां और कम वेतन ने एक पूरी पीढ़ी को अनिश्चितता में धकेल दिया है।
वैश्विक अध्ययन बताते हैं कि भारत का शीर्ष अमीर वर्ग राष्ट्रीय आय के बड़े हिस्से पर कुंडली मारकर बैठा है। कोई भी देश केवल हाईवे, एयरपोर्ट और शेयर बाजार के उछाल से टिकाऊ नहीं बन सकता; उसे ग्रामीण आय, मजबूत वेतन और छोटे उद्यमियों के भरोसे की जरूरत होती है।

निवेश का माहौल और वैश्विक प्रतिस्पर्धा

सुरजीत भल्ला की चेतावनी है कि भारत का निवेश माहौल राजनीतिक स्थिरता के अनुरूप परिणाम नहीं दे रहा है। टेस्ला का भारत में सीमित प्रवेश और स्थानीय विनिर्माण पर अनिश्चितता यह दर्शाती है कि केवल बड़ा बाजार निवेश खींचने के लिए काफी नहीं है, जब तक कि नीतियां स्थिर न हों।

मई 2026 के आंकड़े दिखाते हैं कि ताइवान (TSMC के नेतृत्व में) अपने सेमीकंडक्टर और एआई बूम के दम पर कुल शेयर बाजार मूल्य में भारत के करीब या आगे निकल गया। इतनी कम आबादी वाले देश की यह तकनीकी गहराई भारत के लिए रणनीतिक सवाल खड़ी करती है कि क्या हम भविष्य के क्षेत्रों में वैश्विक क्षमता बना रहे हैं या केवल घरेलू खपत और राजनीतिक ब्रांडिंग पर निर्भर हैं?

संस्थागत साख और कॉरपोरेट एकाधिकार

अडानी समूह पर अमेरिकी अभियोजकों द्वारा लगाए गए रिश्वतखोरी के आरोप और मई 2026 में ईरान प्रतिबंधों के कथित उल्लंघन को लेकर अमेरिकी ट्रेजरी के साथ हुआ समझौता कानूनी रूप से अभी जांच के दायरे में हैं। लेकिन चूंकि यह समूह देश के बंदरगाहों, हवाई अड्डों और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को नियंत्रित करता है, इसलिए पारदर्शिता की मांग लाजिमी है।

भारत को कॉरपोरेट दिग्गजों की जरूरत है, लेकिन राज्य की सत्ता और निजी पूंजी के बीच एक पारदर्शी दूरी और स्वतंत्र नियामकों का होना भी उतना ही अनिवार्य है।

ईंधन की आसमान छूती कीमतें (मई 2026 में मुंबई में पेट्रोल ₹111/लीटर पार) और महंगाई आम नागरिक के लिए आर्थिक अन्याय का प्रतीक बन चुकी हैं। 2027 में उत्तर प्रदेश और गुजरात समेत सात राज्यों के विधानसभा चुनाव भाजपा की राजनीतिक मशीनरी और पीएम मोदी के राष्ट्रवाद के नैरेटिव की परीक्षा लेंगे।

चुनाव जीते जा सकते हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था को हमेशा नैरेटिव कंट्रोल से नहीं चलाया जा सकता। इतिहास केवल सरकारों के दावों को याद नहीं रखता; वह यह भी दर्ज करता है कि अंदरूनी सूत्रों ने क्या चेतावनी दी थी और सत्ता ने किसे नजरअंदाज किया। भारत के पास क्षमता है, बशर्ते उसमें चेतावनियों को वक्त रहते सुनने की संस्थागत विनम्रता हो।

 


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