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भारत की जीडीपी को नया आधार, नई कहानी—क्या सचमुच अर्थव्यवस्था 12% बड़ी हो जाएगी? एक विश्लेषणात्मक ग्राउंड रिपोर्ट…

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✍🏻 राधेश्याम यादव

भारत की जीडीपी का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 किया जाना सिर्फ सांख्यिकीय सुधार नहीं, यह देश की आर्थिक कहानी का नया संस्करण है। केंद्र की भाजपा सरकार 27 फरवरी को यह बड़ा कदम उठाने जा रही है, और अनुमान है कि इस बदलाव से भारत की अर्थव्यवस्था कागज़ पर 8–12% बड़ी दिखेगी। करीब 30 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त आकार सिर्फ इस वजह से जुड़ जाएगा कि देश अब अर्थव्यवस्था को नए चश्मे से देखेगा। सवाल यह है: क्या यह नया चश्मा सच दिखाएगा, या चमकते आंकड़ों के पीछे छिपी हकीकत को धुंधला कर देगा?

केंद्र सरकार ने आर्थिक नाकामियों की सच्चाई से बचने का नया जादुई मंत्र खोज लिया है। आधार वर्ष बदलो और कागज़ पर जीडीपी चमका दो! रोजगार ठहरा, ग्रामीण क्षेत्रों की जेबें खाली हैं, महंगाई बेकाबू है… देश की 80 करोड़ आबादी को 5 किलो सरकारी राशन पर निर्भर रहना पड़ रहा है, मगर आंकड़ों की इस ‘सर्जरी’ से सत्ता को उम्मीद है कि बदहाली भी विकास दिखेगी।

पिछले दशक में भारत ने डिजिटल भुगतान, फिनटेक, ऐप-आधारित सेवाओं, नवीकरणीय ऊर्जा और औपचारिकता के जिस विस्फोटक विस्तार को देखा है, वह पुराने 2011-12 फ्रेम में दिखाई ही नहीं देता था। यूपीआई हर महीने 24 लाख करोड़ रुपये पार कर चुका है, 1.4 करोड़ जीएसटी रजिस्ट्रेशन सप्लाई चेन को बदल चुके हैं, और 18 GW नई हरित बिजली क्षमता जुड़ चुकी है। ऐसे में आंकड़ों का अपडेट होना ज़रूरी था। आईएमएफ ने भी हाल में भारत की राष्ट्रीय खातों को ‘C’ ग्रेड देकर बताया था कि देश दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था तो है, लेकिन पुराने डिफ्लेटर और अधूरे डेटा इसके पैमाने को सही तरह नहीं दर्शाते।

नई श्रृंखला लागू होते ही भारत का जीडीपी आकार 4.4–4.5 ट्रिलियन डॉलर के बीच पहुंच सकता है, जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था। सेवाक्षेत्र का हिस्सा 62% तक पहुंच जाएगा और सरकार के ऋण-से-जीडीपी अनुपात तथा वित्तीय घाटा, दोनों बेहतर दिखेंगे। बजट खर्च और राज्यों की उधारी सीमा भी इससे प्रभावित होगी। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की नजर में भारत का कद और बड़ा होगा।

लेकिन, जमीनी हकीकत उतनी सरल नहीं है। बढ़ती अर्थव्यवस्था का यह चमकदार फ्रेम ग्रामीण आय, रोजगार और श्रम बाज़ार की सच्चाई से टकराता है। देश की लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट 42.4% पर अटकी है। पिछले दस साल से इस आंकड़े में कोई खास सुधार नहीं आया है। रोजगार सृजन जीडीपी की रफ्तार का साथ नहीं दे रहा। लाखों युवा डिग्री लेकर भी स्थायी आय के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, जो 40% रोजगार और लगभग 20% उत्पादन का आधार है, अब भी अस्पष्ट और कम आंकी गई है। अगर नया आधार भी इस हिस्से को ठीक से नहीं पकड़ पाया, तो ‘नई जीडीपी’ पुरानी समस्याओं के साथ ही आएगी।

व्यापारियों और छोटे उद्यमों की वास्तविक स्थिति भी चमकते आंकड़ों से मेल नहीं खाती। एमएसएमई सेक्टर में क्रेडिट तक पहुंच अब भी कठिन है। ग्रामीण खपत ने महामारी के बाद जितनी गिरावट देखी, वह अब तक पूरी तरह नहीं संभली। उधर, खाद्य महंगाई दर भी 8% से ऊपर झूलती रही है, जिससे उपभोक्ता खर्च दबा रहा। ऐसे में अगर कागज पर आय बढ़ती दिखेगी, तो गरीबी रेखा और कल्याणकारी योजनाओं की पात्रता तय करना और कठिन हो सकता है।

आंकड़ों की सच्चाई यह भी है कि जीडीपी बढ़ने का मतलब जरूरी नहीं कि लोगों की जिंदगी बेहतर हुई हो। अगर 30 लाख करोड़ रुपये का ‘सांख्यिकीय विस्तार’ रोजगार, आय, या खपत में महसूस नहीं होता, तो यह बदलाव अधिक राजनीतिक होगा, कम सामाजिक।

भारत की अर्थव्यवस्था वास्तव में बदल रही है। डिजिटल, ग्रीन और सर्विस ड्रिवन भविष्य की ओर। लेकिन उस भविष्य की सफलता का फैसला आधार वर्ष नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि क्या विकास की रोशनी गांव, खेत, फैक्ट्री और छोटे शहरों तक पहुंचती है या सिर्फ आर्थिक रिपोर्टों को चमकाती है।

नई जीडीपी कहानी बड़ी जरूर है, पर क्या यह अधिक सच्ची है, इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।


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