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हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत पर अमेरिकी हमला: मोदी सरकार की चुप्पी पर विपक्ष का हमला

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✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | हिंद महासागर में अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी युद्धपोत आईरिस देना को टॉरपीडो से निशाना बनाकर डुबोने की घटना ने भारत की विदेश नीति और केंद्र सरकार की कूटनीतिक भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि भारत के समुद्री पड़ोस में हुई इस सैन्य कार्रवाई पर मोदी सरकार की चुप्पी देश की स्वतंत्र विदेश नीति को कमजोर कर रही है।

राज्यसभा सदस्य कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय मौन साध लेते हैं, जब देश को स्पष्ट और साहसी नेतृत्व की जरूरत होती है। उन्होंने याद दिलाया कि 1953 में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ईरान में रूसी सेना की मौजूदगी का विरोध करते हुए साफ कहा था कि ईरानी जनता के अधिकारों का सम्मान होना चाहिए। सिब्बल के मुताबिक यह उस दौर की कूटनीतिक स्पष्टता थी, जब भारत ने वैश्विक दबावों के बावजूद अपनी स्वतंत्र आवाज बनाए रखी।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने 1994 का उदाहरण भी दिया, जब प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के प्रस्ताव को रोकने के लिए तत्कालीन विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजा था। उनका कहना था कि मजबूत प्रधानमंत्री वही होता है जो राष्ट्रीय हितों के सवाल पर स्पष्ट रुख अपनाए।

इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने भी सरकार को घेरते हुए कहा कि भारत के समुद्री क्षेत्र के करीब किसी विदेशी शक्ति द्वारा सैन्य कार्रवाई होना गंभीर मामला है और इस पर भारत को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। पायलट के मुताबिक विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और केंद्र सरकार की लगातार चुप्पी दुनिया को यह संदेश दे रही है कि भारत अंतरराष्ट्रीय मामलों में दबाव में दिखाई दे रहा है।

वामपंथी दल माकपा ने भी इस घटना को भारत के रणनीतिक अधिकारों पर सीधा हमला बताते हुए केंद्र की चुप्पी को “स्वतंत्र विदेश नीति का निचला स्तर” करार दिया है। पार्टी का कहना है कि भारतीय नौसेना की मेजबानी में आयोजित बहुपक्षीय अभ्यास से लौट रहे एक निहत्थे ईरानी पोत पर हमला भारत की कूटनीतिक साख को चुनौती देता है।


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