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इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का नया हथियार: GPS जैमिंग से जहाज-विमान भटक रहे

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✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | आधुनिक युद्ध अब केवल हथियारों और मिसाइलों तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम में लड़ा जाने वाला “इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर” तेजी से रणनीतिक हथियार बनता जा रहा है। इसी कड़ी में जीपीएस जैमिंग ऐसी तकनीक के रूप में उभरी है, जो बिना गोली चलाए ही विमान, जहाज़, ड्रोन और सैन्य प्लेटफॉर्म की नेविगेशन प्रणाली को प्रभावित कर सकती है।

जीपीएस जैमिंग में शक्तिशाली रेडियो सिग्नल प्रसारित कर उपग्रह से आने वाले असली जीपीएस सिग्नल को दबा दिया जाता है। इसके परिणामस्वरूप नेविगेशन सिस्टम या तो गलत लोकेशन दिखाने लगते हैं या पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं। सैन्य अभियानों में इसका इस्तेमाल दुश्मन की निगरानी और सटीक हमले की क्षमता को कमजोर करने के लिए किया जाता है।

हाल के समय में इस तकनीक का असर नागरिक यातायात पर भी दिखाई देने लगा है। यूरोप और मध्य पूर्व के कई क्षेत्रों में विमान और जहाज़ जीपीएस सिग्नल में गड़बड़ी की घटनाओं का सामना कर चुके हैं। यूक्रेन युद्ध के दौरान यह तकनीक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में आई, जबकि हालिया अमेरिका इजरायल और ईरान के मौजूदा तनाव के बीच होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास भी समुद्री नेविगेशन सिस्टम में असामान्य गतिविधियां दर्ज की गई हैं।

समुद्री एआई कंपनी विंडवर्ड की सीनियर मरीन इंटेलिजेंस एनालिस्ट मिशेल वीज़ बॉकमैन ने क्षेत्र के डिजिटल मैप का विश्लेषण करते हुए लगभग 35 असामान्य “क्लस्टर” देखे, जिनमें कई जहाज़ों की लोकेशन एक ही गोल आकृति में दिखाई दे रही थी। कुछ जहाज़ों के संकेत समुद्र के बजाय जमीन पर दर्ज हो रहे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह जीपीएस जैमिंग या स्पूफिंग का स्पष्ट संकेत हो सकता है, जिससे जहाज़ों के ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम (AIS) की सटीकता प्रभावित हो जाती है।

रॉयल इंस्टीट्यूट फॉर नेविगेशन के निदेशक रैम्ज़ी फैरागर के अनुसार, खुले जीएनएसएस सिग्नल बेहद कमजोर होते हैं और इन्हें बाधित करना तकनीकी रूप से आसान है। उनके मुताबिक, ईरान के तटीय इलाकों के पास लगातार बढ़ती जैमिंग गतिविधियां समुद्री दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ा सकती हैं।

भारत भी इस उभरते इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षेत्र में अपनी क्षमताएं विकसित कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने सेना के लिए स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम तैयार किए हैं, जो दुश्मन के संचार और रडार सिग्नलों को बाधित करने में सक्षम हैं। इसके अलावा भारतीय क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली NavIC को भी सैन्य उपयोग के लिए एन्क्रिप्टेड सिग्नल के साथ विकसित किया गया है।
रक्षा मंत्रालय और DRDO के अनुसार भारतीय सशस्त्र बलों में एंटी-जैमिंग रिसीवर और मल्टी-सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से शामिल किया जा रहा है, ताकि युद्ध या संकट की स्थिति में नेविगेशन और संचार प्रणालियां सुरक्षित रह सकें।


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