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AI  की गर्मी में झुलसती दुनिया: डेटा सेंटर्स ने बनाया ‘हीट आइलैंड’, 9 डिग्री तक बढ़ा तापमान

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  • कैंब्रिज यूनिवर्सिटी का चौंकाने वाला खुलासा

  • 34 करोड़ लोग रेडिएशन और थर्मल उत्सर्जन के घेरे में

  • 10 किलोमीटर तक फैल रही है कृत्रिम गर्मी

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की वैश्विक होड़ अब धरती के तापमान के लिए नया संकट बनकर उभरी है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने नासा के सैटेलाइट डेटा का विश्लेषण कर दुनिया को चेतावनी दी है कि AI को संचालित करने वाले विशालकाय डेटा सेंटर्स अपने आसपास ‘हीट आइलैंड’ (गर्मी के द्वीप) विकसित कर रहे हैं। इस अध्ययन के अनुसार, इन सेंटर्स के कारण आसपास की जमीन का तापमान औसतन 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है, जबकि कुछ गंभीर मामलों में यह उछाल 9 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया है।

अदृश्य दुश्मन: 10 किलोमीटर तक फैला थर्मल असर

लीड रिसर्चर एंड्रिया मरिनोनी के नेतृत्व में हुए इस शोध में खुलासा हुआ कि डेटा सेंटर शुरू होने के महज कुछ ही महीनों के भीतर उसका थर्मल प्रभाव दिखने लगता है। यह गर्मी सेंटर के मुख्य स्थान से लगभग 10 किलोमीटर के दायरे में फैल जाती है, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी और जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। शोधकर्ताओं ने स्पेन के अरागोन और मैक्सिको के बाजियो क्षेत्र का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां पिछले 20 वर्षों में तापमान में ऐसी बढ़ोत्तरी देखी गई है, जिसका ग्लोबल वार्मिंग के सामान्य कारकों से कोई संबंध नहीं है।

भारत पर मंडराता संकट: 2032 तक 13 गुना बढ़ेगी बिजली की भूख

भारत में डेटा सेंटर्स का बाजार तेजी से पैर पसार रहा है। वर्तमान में मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों में करीब 150 सक्रिय डेटा सेंटर्स हैं, जिनकी क्षमता 1.5 गीगावाट (GW) है। लेकिन असली चिंता भविष्य को लेकर है। अनुमान है कि 2031-32 तक भारत में डेटा सेंटर्स की बिजली मांग 1 GW से बढ़कर 13 GW तक पहुंच जाएगी। चूंकि भारत में बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा अब भी कोयले पर निर्भर है, इसलिए यह बढ़ती मांग न केवल स्थानीय स्तर पर गर्मी बढ़ाएगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को भी कड़ी चुनौती देगी।

ऊर्जा की बेलगाम खपत और भविष्य की चुनौतियां

दुनिया भर में मौजूद करीब 12,000 डेटा सेंटर्स वर्तमान में वैश्विक बिजली का लगभग 1.5% हिस्सा डकार रहे हैं। आईईए (IEA) और गार्टनर की रिपोर्ट बताती हैं कि 2030 तक यह मांग दोगुनी हो सकती है, जिसमें अकेले AI सर्वर्स की खपत में पांच गुना वृद्धि का अनुमान है। यह स्थिति इसलिए भी भयावह है क्योंकि इन सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए लाखों गैलन पानी की खपत होती है और बैकअप के लिए इस्तेमाल होने वाले डीजल जनरेटर वायु प्रदूषण को और घातक बना रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते रिन्यूएबल एनर्जी और ‘वेस्ट हीट रीयूज’ जैसी तकनीकों को अनिवार्य नहीं किया गया, तो AI की यह चमक इंसानी सेहत और अर्थव्यवस्था को भीषण गर्मी की भट्टी में झोंक देगी। फिलहाल यह अध्ययन पीयर-रिव्यू के दौर में है, लेकिन इसके शुरुआती आंकड़ों ने दुनिया भर के पर्यावरणविदों और नीति निर्माताओं की नींद उड़ा दी है।
पर्यावरण पर नजर रखनेवालों का कहना है कि डिजिटल भविष्य की राह पर बढ़ते हुए हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रगति पर्यावरण की कीमत पर न हो। सस्टेनेबल इनोवेशन ही एकमात्र रास्ता है जो एआई की होड़ को सार्थक बना सके।

 


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