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थ्योरी फेल: रुपया 64% टूटा फिर भी 12 साल में 85% बढ़ा भारत का इंपोर्ट

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  • किताबी अर्थशास्त्रियों को लगा बड़ा झटका

  • मई 2014 में जो आयात 529 अरब डॉलर था, वो मई 2026 तक 979 अरब डॉलर पार

  • तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स की भूख ने बिगाड़ा राजकोषीय घाटे का गणित

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई /नई दिल्ली | ग्लोबल इकोनॉमी का यह पारंपरिक सिद्धांत भारतीय बाजारों में पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है कि कमजोर होती करेंसी आयात में कटौती कर अर्थव्यवस्था को जरूरी संतुलन देती है। पिछले 12 वर्षों के जमीनी आर्थिक आंकड़े इस किताबी थ्योरी के बिल्कुल विपरीत कहानी बयां कर रहे हैं।

मई 2014 से लेकर 21 मई 2026 के बीच अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 64 फीसदी से ज्यादा टूट चुका है, लेकिन इसके बावजूद देश की आयात की भूख कम होने के बजाय और आक्रामक हुई है। इस दौरान भारत का कुल आयात बिल करीब 85 फीसदी बढ़ गया है, जिसने राजकोषीय मोर्चे पर सरकार की चुनौतियों को सीधे तौर पर बढ़ा दिया है। भारत की यह स्थिति स्पष्ट करती है कि देश की आयात निर्भरता ढांचागत है, जिसे केवल करेंसी की गिरावट से नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

वाणिज्य मंत्रालय के ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2014-15 में भारत का कुल मर्चेंडाइज और सर्विसेज आयात 529.61 अरब डॉलर था। अब वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक यह आंकड़ा बढ़कर 979.40 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। मूल्य के लिहाज से पिछले 12 वर्षों में भारत का सालाना आयात बिल 449.79 अरब डॉलर बढ़ा है। महंगे होते डॉलर के बावजूद कुल आयात में दर्ज की गई यह 84.92 फीसदी की भारी बढ़ोतरी घरेलू बाजार में विदेशी सामानों की अनिवार्य मांग को दर्शाती है।

भारत के इस विशाल आयात बिल को सबसे ज्यादा गति उन क्षेत्रों से मिली है जहां घरेलू स्तर पर कटौती की गुंजाइश बेहद सीमित है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें सौ डॉलर प्रति बैरल के आसपास बने होने से वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का पेट्रोलियम आयात 170 अरब डॉलर को पार कर गया है, जबकि अकेले अप्रैल 2026 में यह 18.6 अरब डॉलर रहा। भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी क्रूड ऑयल आयात करता है और देश में बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों के कारण आयात की मात्रा भी 2014 के मुकाबले 30 फीसदी से अधिक बढ़ चुकी है।

यही स्थिति इलेक्ट्रॉनिक्स गुड्स सेक्टर की भी है, जहां डिजिटल इंडिया और कंज्यूमर डिमांड ने इसे देश का दूसरा सबसे बड़ा आयात बिल बना दिया है। अप्रैल 2026 के एक अकेले महीने में इलेक्ट्रॉनिक्स आयात उछलकर 12.78 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो पिछले वर्ष अप्रैल में 9.25 अरब डॉलर था। सेमीकंडक्टर, कंपोनेंट्स और टेलीकॉम गियर की आयातित मात्रा 2014 के मुकाबले तीन गुना से अधिक हो चुकी है।

दूसरी ओर, सरकार द्वारा सोने पर सीमा शुल्क को बढ़ाकर 15 फीसदी करने के बावजूद इसका क्रेज कम नहीं हुआ है। अप्रैल 2026 में सोने का आयात 81.69 फीसदी की छलांग लगाकर 5.63 अरब डॉलर पर पहुंच गया। मात्रा के लिहाज से भारत का सोने का आयात सालाना 700 से 900 टन के बीच बना हुआ है, लेकिन वैश्विक बाजार में सोने की आसमान छूती कीमतों ने इसकी वैल्यू को भारी बढ़ा दिया है।

इस पूरे कालखंड में भारतीय रुपये के अवमूल्यन ने आयात को लगातार महंगा करने का काम किया। मई 2014 में जब केंद्र में नई सरकार ने कार्यभार संभाला था, तब अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 58.68 रुपये के स्तर पर था। पिछले 12 वर्षों में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों और वैश्विक संकटों के दबाव के चलते रुपया लगातार रिकॉर्ड निचले स्तरों की तरफ फिसला और आज यानी 21 मई 2026 को यह डॉलर के मुकाबले 96.33 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर बंद हुआ। इस तरह मई 2014 से अब तक भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 37.65 रुपये यानी लगभग 64.16 फीसदी टूट चुका है।

महंगे डॉलर और बढ़ते आयात बिल के इस दोहरे दबाव का सीधा असर देश के राजकोषीय घाटे पर पड़ा है। जब रुपया कमजोर होता है, तो फर्टिलाइजर, कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का आयात महंगा होने से सरकार पर सब्सिडी का बोझ अप्रत्याशित रूप से बढ़ता है। वित्त वर्ष 2014-15 में भारत का वित्तीय घाटा जीडीपी का 4.0 फीसदी था, जो वित्त वर्ष 2025-26 के हालिया बजटीय आंकड़ों के अनुसार जीडीपी के 4.4 फीसदी पर पहुंच गया है।

हालांकि पिछले कुछ वर्षों में देश के मजबूत डायरेक्ट टैक्स और रिकॉर्ड जीएसटी कलेक्शन ने राजकोष को एक सुरक्षा कवच दिया है, जिसने इस घाटे को 4.4 फीसदी के दायरे में बांधकर रखने में मदद की, अन्यथा अनियंत्रित आयात बिल इसे और ऊंचे स्तर पर धकेल सकता था।


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