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‘ठोक दो’ मॉडल के नौ साल: यूपी में अदालतों से ज्यादा गोलियों पर भरोसा

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  • 17 हजार से ज्यादा एनकाउंटर, 289 अपराधी ढेर

  • ‘रामराज्य’ के दावों के बीच सवाल- क्या पुलिस ही अब जज, ज्यूरी और जल्लाद बन चुकी है?

✍️ प्रहरी संवाददाता, लखनऊ | उत्तर प्रदेश में कागजी विकास और सुशासन के दावों के बीच ‘ठोक दो’ संस्कृति ने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर लिए हैं। राज्य की भाजपा सरकार जिस सूबे को ‘अपराध मुक्त’ करने का ढिंढोरा पीटते नहीं थकती, उसी के सरकारी आंकड़े बयां कर रहे हैं कि पिछले नौ वर्षों में कानून-व्यवस्था को बहाल रखने के लिए अदालतों की नहीं, बल्कि बंदूकों की जरूरत पड़ी है। यह आंकड़ा यह समझने के लिए काफी है कि सूबे में न्याय व्यवस्था को ताक पर रखकर किस कदर ‘ऑन द स्पॉट’ इंसाफ की परंपरा को संस्थागत रूप दे दिया गया है।

बता दें कि भाजपा सरकार पिछले नौ वर्षों से सूबे में ‘सुशासन’, ‘रामराज्य’ और ‘जीरो टॉलरेंस’ का राजनीतिक ब्रांड बेच रही है, लेकिन सरकार के अपने ही आंकड़े इस दावे की चमक के पीछे छिपी भयावह तस्वीर सामने ला रहे हैं। अपराध मुक्त प्रदेश का दावा करने वाली सरकार के कार्यकाल में पिछले नौ साल के भीतर 17,043 पुलिस मुठभेड़ हुईं, जिनमें 289 दुर्दांत अपराधियों को मौके पर ही मार गिराया गया।

सोमवार को जारी आधिकारिक बयान के मुताबिक, इस दौरान 34,253 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया, जबकि 11,834 अपराधी मुठभेड़ों में घायल हुए। आंकड़े बता रहे हैं कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था सुधारने का सरकारी मॉडल अदालतों, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया से ज्यादा बंदूकों और गोलियों पर टिका दिखाई दिया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर भाजपा सरकार का ‘खौफ’ अपराधियों में इतना गहरा बैठ चुका है, तो फिर हर साल हजारों एनकाउंटर की नौबत आखिर क्यों आ रही है?

सरकार इन आंकड़ों को उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन विपक्ष इसे भाजपा के उस ‘ठोक दो’ मॉडल की नाकामी बता रहा है, जिसमें अपराध खत्म होने के बजाय मुठभेड़ों की संख्या लगातार बढ़ती गई।

आलोचकों का कहना है कि अगर नौ साल बाद भी पुलिस को सड़कों पर गोलियां चलाकर कानून-व्यवस्था संभालनी पड़ रही है, तो यह प्रशासनिक सफलता नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है।

सबसे ज्यादा 4,813 मुठभेड़ मेरठ ज़ोन में हुईं, जहां 97 अपराधियों को मार गिराया गया। 8,921 गिरफ्तारियां हुईं और 3,513 अपराधी घायल हुए। मेरठ अब कानून व्यवस्था से ज्यादा ‘एनकाउंटर कैपिटल’ के रूप में चर्चा में दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाले वाराणसी ज़ोन में भी 1,292 मुठभेड़ हुईं, जिनमें 29 अपराधी मारे गए। वहीं आगरा ज़ोन में 2,494 मुठभेड़ों के दौरान 24 अपराधियों को ढेर किया गया। बरेली ज़ोन में 21 और लखनऊ ज़ोन में 20 अपराधियों के मारे जाने का दावा किया गया है। गाजियाबाद कमिश्नरी में 789 मुठभेड़ों में 18 अपराधियों को मार गिराया गया।

कानपुर ज़ोन और लखनऊ कमिश्नरी में 12-12 अपराधियों के एनकाउंटर की बात कही गई है, जबकि प्रयागराज ज़ोन में 11 अपराधी मारे गए। गौतमबुद्ध नगर, गोरखपुर और वाराणसी कमिश्नरी समेत कई इलाकों में भी मुठभेड़ों के लंबे आंकड़े सामने आए हैं।

इस पूरे दौर में सबसे बड़ी कीमत खुद पुलिसकर्मियों ने चुकाई। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अपराधियों से मुकाबले के दौरान 18 पुलिसकर्मी शहीद हुए और 1,852 जवान घायल हुए। अकेले मेरठ ज़ोन में 477 पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि दो जवानों की मौत हो गई।

आंकड़े यह भी संकेत दे रहे हैं कि भाजपा सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ मॉडल में अपराध नियंत्रण का स्थायी समाधान अब भी नहीं निकल पाया है। अपराधियों के नेटवर्क तोड़ने, न्यायिक प्रक्रिया मजबूत करने और सामाजिक सुरक्षा तंत्र खड़ा करने के बजाय सरकार का पूरा फोकस ‘एनकाउंटर राजनीति’ पर सिमटा दिखाई देता है। यही वजह है कि ‘रामराज्य’ के दावों के बीच उत्तर प्रदेश में गोलियों की गूंज अब भी थमने का नाम नहीं ले रही।


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