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उपग्रह डेटा से खुली पोल, जीवाश्म ईंधन पर टिकी है भारत की रफ्तार
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई/नई दिल्ली | आर्थिक विकास की तेज रफ्तार के बीच भारत के छोटे और मध्यम शहर अब गंभीर प्रदूषण संकट की चपेट में आते जा रहे हैं। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि समय रहते भारत ने अपने शहरी विकास को ग्रीन एनर्जी और टिकाऊ सार्वजनिक परिवहन से नहीं जोड़ा, तो देश के समृद्ध शहर रहने लायक नहीं बचेंगे।
अंतरराष्ट्रीय जर्नल नेचर सिटीज में प्रकाशित एक वैश्विक अध्ययन ने खुलासा किया है कि दुनिया के सबसे तेजी से अमीर होते, लेकिन प्रदूषण से जूझ रहे 390 शहरों में 138 शहर अकेले भारत के हैं। यह कुल आंकड़े का करीब 35 प्रतिशत है, जो किसी भी अन्य देश से सबसे ज्यादा है। रिपोर्ट में महाराष्ट्र के औद्योगिक शहर नासिक को दुनिया के शीर्ष 10 “डर्टियर एंड रिचर” शहरों में शामिल किया गया है।
अध्ययन में वर्ष 2019 से 2024 के बीच दुनिया के 5,435 शहरों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने उपग्रह आधारित नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) डेटा और शहरों की आर्थिक गतिविधियों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला कि भारत का शहरी विकास अब भी बड़े पैमाने पर पेट्रोल-डीजल, कोयला आधारित बिजली संयंत्रों और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर निर्भर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत के 902 शहरों में से 15 प्रतिशत से अधिक शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक बढ़ा है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि चीन ने सख्त पर्यावरण नियमों, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्वच्छ ऊर्जा के जरिए अपने अधिकांश शहरों को “क्लीनर एंड रिचर” श्रेणी में पहुंचा दिया है। इसके विपरीत भारत के तेजी से विकसित हो रहे छोटे शहर प्रदूषण के नए केंद्र बनते जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ये शहर आर्थिक रूप से तो मजबूत हो रहे हैं और यहां अरबपतियों व जीडीपी का ग्राफ भी लगातार बढ़ रहा है, लेकिन वाहनों की अनियंत्रित संख्या, उद्योगों से निकलते धुएं और बुनियादी ढांचे के अभाव ने इन्हें गैस चैंबर में तब्दील कर दिया है। औद्योगिक उत्सर्जन और कमजोर शहरी बुनियादी ढांचे ने इन शहरों की हवा को जहरीला बना दिया है।
हालांकि दिल्ली, मुंबई और कोलकाता को इस अध्ययन में अपेक्षाकृत स्वच्छ और समृद्ध होते शहरों की श्रेणी में रखा गया है, जहां हाल के वर्षों में प्रदूषण नियंत्रण उपायों का असर दिखाई दिया है।
