✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, नई दिल्ली | MGNREGA से लेकर NBA तक, मोदी सरकार के 11 साल के कार्यकाल में योजनाओं के नाम बदलने को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। संसद के शीतकालीन सत्र में जैसे ही मनरेगा से जुड़ा नया विधेयक लोकसभा में पेश हुआ, विपक्ष ने सरकार पर एक बार फिर ‘नाम बदलो, ब्रांड बदलो’ की नीति अपनाने का आरोप जड़ दिया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का दावा है कि केंद्र सरकार ने पिछले एक दशक से अधिक समय में UPA शासनकाल की कम से कम 25 से 28 योजनाओं और परियोजनाओं को नए नामों और नए ब्रांड के साथ पेश किया है।
विपक्ष का कहना है कि यह प्रक्रिया सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि पूर्ववर्ती सरकारों की राजनीतिक और वैचारिक विरासत को मिटाने की कोशिश है। कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि योजनाओं का नाम बदलकर सरकार उपलब्धियों का श्रेय अपने खाते में दर्ज कराने की रणनीति पर काम कर रही है। वहीं सत्तापक्ष इस आरोप को खारिज करते हुए कहता है कि नाम बदलने के साथ योजनाओं के दायरे, लक्ष्य और कार्यप्रणाली में भी बुनियादी बदलाव किए गए हैं।
मनरेगा को लेकर यह विवाद और गहरा गया है। 2005 में शुरू हुई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को अब ‘विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन’ के नए ढांचे में लाने का प्रस्ताव सामने आया है। सरकार का दावा है कि इससे रोजगार के दिन बढ़ेंगे और ग्रामीण विकास का फोकस व्यापक होगा, जबकि विपक्ष इसे मनरेगा की मूल भावना से छेड़छाड़ बता रहा है।
इंदिरा आवास योजना से प्रधानमंत्री आवास योजना, जेएनएनयूआरएम से अमृत मिशन, राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना से दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना और निर्मल भारत अभियान से स्वच्छ भारत मिशन सहित कई उदाहरणों ने इस बहस को और धार दी है। सवाल अब सिर्फ नामों का नहीं, बल्कि उस राजनीति का है, जिसमें ‘नया भारत’ पुराने ढांचों और पहचानों के पुनर्पैकेजिंग के जरिए गढ़ा जा रहा है।
