2025 में 70% आईपीओ ने दिया था बंपर रिटर्न, 2026 में घटकर 55% पर सिमटा मुनाफा
महंगे वैल्यूएशन और बाजार की सुस्ती से आधी कंपनियां इश्यू प्राइस के नीचे
✍️ विशेष संवाददाता, मुंबई | प्राथमिक शेयर बाजार (आईपीओ) में आसान मुनाफे और ‘लिस्टिंग गेन’ के भरोसे दांव लगाने वाले खुदरा निवेशकों के लिए सितंबर और अक्टूबर का महीना कड़वी हकीकत लेकर आया है। 1 सितंबर से 9 अक्टूबर के बीच मेनबोर्ड और एसएमई सेगमेंट को मिलाकर लिस्ट हुए कुल 38 पब्लिक इश्यू में से 35 प्रतिशत से अधिक कंपनियां ‘रेड सिग्नल’ में फिसल गई हैं, यानी उनका मौजूदा भाव (LTP) इश्यू प्राइस से नीचे आ चुका है।
बाजार में छाई सुस्ती और अत्यधिक महंगे वैल्यूएशन के चलते केवल 65 प्रतिशत निर्गम ही हरे निशान में टिक पाए हैं। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) और कुछ चुनिंदा आईटी व टेक निर्गमों ने जरूर 35 से 75 प्रतिशत तक का मजबूत लिस्टिंग रिटर्न दिया, लेकिन अधिकांश कंपनियों में लिस्टिंग के पहले ही दिन से शुरू हुई बिकवाली ने खुदरा निवेशकों की मूल पूंजी में 10 से 15 प्रतिशत की सेंध लगा दी है।
मार्केट की रिपोर्ट से साफ है कि बाजार में आई कंपनियों के वित्तीय बुनियादी ढांचे में भारी असंतुलन है। जहां मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और टेक कंपनियों का रिटर्न ऑन इक्विटी (ROE) व रिटर्न ऑन कैपिटल एम्प्लॉयड (ROCE) 22 से 30 प्रतिशत के दायरे में दर्ज हुआ, वहीं कर्ज के बोझ तले दबी और पारंपरिक कंपनियों का ROCE 10 प्रतिशत के नीचे अटका हुआ है। इसके बावजूद इन कंपनियों ने प्राइस-टू-बुक वैल्यू (P/B) के आधार पर 3 गुना से लेकर 15 गुना तक का अवास्तविक प्रीमियम वसूला।
ऐसवेक्टर (स्नैपडील की मूल कंपनी) जैसी कंपनियों का अपने इश्यू प्राइस से 11.5 प्रतिशत से अधिक टूटकर कारोबार करना यह साबित करता है कि प्रमोटरों द्वारा तय किया गया ऊंचा भाव लिस्टिंग के बाद बाजार की कसौटी पर टिक नहीं सका। ग्रे-मार्केट के कृत्रिम प्रीमियम के लालच में आए छोटे निवेशक अब ऊंचे भाव पर शेयर लेकर फंस चुके हैं।
यह स्थिति साल 2025 और 2026 के बीच आए बड़े नीतिगत व मनोवैज्ञानिक बदलाव को भी उजागर करती है। साल 2025 आईपीओ इतिहास का सबसे स्वर्णिम दौर साबित हुआ था, जब रिकॉर्ड संख्या में कंपनियों ने बाजार से 1.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक की पूंजी जुटाई थी और 70 प्रतिशत से अधिक पब्लिक इश्यू ने निवेशकों की झोली भरी थी।
इसके उलट, 2026 में आईपीओ का सफलता अनुपात तेजी से गिरकर 55 और 45 प्रतिशत के नाजुक मोड़ पर आ पहुंचा है। साल 2026 की दूसरी छमाही में बाजार की अनिश्चितता और ऊंचे ब्याज दरों के माहौल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना मजबूत बैलेंस शीट और मुनाफे वाली कंपनियों को बाजार अब प्रीमियम देने को तैयार नहीं है। आईपीओ को ‘फ्री मनी’ मानकर आंख मूंदकर आवेदन करने वाले आम निवेशकों के लिए यह दौर भारी जोखिम का सबब बन चुका है।
