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महाराष्ट्र में चुनाव आयोग का डिजिटल ‘चमत्कार’: 2.70 लाख यंग वोटर कागजों पर ‘शतायु’ 

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  • नाशिक के 3 विधानसभा क्षेत्रों में ही  2.37 लाख लोग 100 से 150 साल के बीच मिले
  • CEO की कड़ी आपत्ति के बाद सुधरी गलती, EC के भीतर डेटा केंद्रीकरण पर उठे सवाल
  • डिजिटल सिस्टम की भारी चूक: जन्म वर्ष 1900 दर्ज होने से हड़कंप

    ✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई | महाराष्ट्र की मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के दौरान एक ऐसा चौंकाने वाला सिस्टम फॉल्ट सामने आया, जिसने एक झटके में राज्य के 2,70,313 मतदाताओं को कागजों पर 100 से 150 वर्ष का ‘शतायु’ बुजुर्ग बना दिया। केंद्रीय सॉफ्टवेयर में आई गंभीर तकनीकी खामी के कारण इन सभी जीवित व युवा मतदाताओं का जन्म वर्ष सीधे ‘1900’ दर्ज हो गया था। हद तो यह रही कि इनमें से एक बड़ी आबादी की उम्र ठीक 126 वर्ष अंकित पाई गई। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) कार्यालय द्वारा लगातार उठाई गई आपत्तियों और एक महीने से अधिक चले पत्राचार के बाद आखिरकार भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने केंद्रीय सर्वर से इस गड़बड़ी को दुरुस्त किया।

    इस भारी विसंगति का 88 प्रतिशत हिस्सा यानी 2,37,974 मतदाता अकेले नाशिक जिले के तीन विधानसभा क्षेत्रों कलवन (एसटी), चांदवड और देवलाली (एसटी) में दर्ज हुए, जबकि बाकी 32,339 मामले राज्य के अन्य हिस्सों में पाए गए। जब ड्राफ्ट रोल में यह गड़बड़ी पकड़ी गई, तो राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम ने आयोग के आईटी प्रभाग से एसआईआर-पूर्व डेटा और फॉर्म्स का एक्सेल रिकॉर्ड मांगा।

    दिल्ली मुख्यालय से जानकारी मिलने में देरी होने पर चोकलिंगम ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग को कड़ा पत्र लिखकर आयोग के आईटी सेल को ‘बिना किसी देरी’ के डेटा उपलब्ध कराने का निर्देश देने की मांग की। इसके बाद पड़ताल हुई और 6 अक्टूबर को आयोग ने तकनीकी गड़बड़ी सुधारने की पुष्टि की।

    यह मामला केवल एक सॉफ्टवेयर विफलता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने निर्वाचन आयोग के भीतर मतदाता डेटाबेस के अत्यधिक केंद्रीकरण को लेकर छिड़ी आंतरिक कलह को भी उजागर कर दिया है। इस प्रकरण ने साबित किया कि राज्य के चुनाव अधिकारी अपने ही वोटरों के रिकॉर्ड्स में सुधार के लिए दिल्ली स्थित केंद्रीय आईटी सिस्टम के मोहताज हैं।

    इससे पहले चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा था कि कानूनी रूप से सूची में बदलाव का अधिकार रखने वाले मुख्य निर्वाचन अधिकारियों, जिला निर्वाचन अधिकारियों और ईआरओ (ERO) के पास ईआरओनेट पोर्टल तक ‘उचित और पूर्ण पहुंच’ तक नहीं है।

वहीं चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने भी इसे मतदाता डेटाबेस का ‘क्रमिक केंद्रीकरण’ बताते हुए आगाह किया था। यह घटना साफ करती है कि स्थानीय स्तर से डेटा नियंत्रण छीनकर केंद्रीय सर्वरों के हवाले करने से चुनावी मशीनरी की विश्वसनीयता पर कितना बड़ा सवालिया निशान लग रहा है।

 


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