भारत में टेक दिग्गजों के डेटा सेंटरों पर जल संकट और जनविरोध का दोहरा विस्फोट
✍️ डिजिटल न्यूज डेस्क, मुंबई/नई दिल्ली | दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी का पेट भरने के लिए केवल 4 प्रतिशत मीठे जल संसाधनों पर निर्भर भारत में वैश्विक तकनीकी महाशक्तियों के डेटा सेंटर नए पर्यावरणीय और सामाजिक संकट का केंद्र बन गए हैं। एसएंडपी ग्लोबल की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार इस दशक में देश के 60 से 80 प्रतिशत डेटा सेंटरों को भीषण जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
रिसर्च फर्म मॉर्डोर इंटेलिजेंस के ताजा आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में देश भर के डेटा सेंटरों ने करीब 150 अरब लीटर पानी की भारी-भरकम खपत दर्ज की, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता और क्लाउड कंप्यूटिंग के विस्तार के चलते वर्ष 2030 तक दोगुनी होकर 300 अरब लीटर से अधिक पहुंचने का अनुमान है। मुंबई के पास 54 एकड़ में प्रस्तावित अमेज़न का विशाल डेटा सेंटर इस वैश्विक टकराव का सबसे बड़ा फलैशपॉइंट बनकर उभरा है, जहां स्थानीय नागरिकों, बुजुर्गों और पर्यावरणविदों ने ‘डेटा सेंटर ऊर्जा पिशाच हैं’ के नारों के साथ सड़कों पर उतरकर इस परियोजना को तत्काल अन्यत्र स्थानांतरित करने की मांग शुरू कर दी है।
पश्चिमी और विकसित देशों द्वारा अपने विशाल डेटा सेंटर भारत और अन्य विकासशील देशों में स्थानांतरित करने के पीछे सोची-समझी रणनीतिक और आर्थिक वजहें काम कर रही हैं। अमेरिका के वर्जीनिया और यूरोपीय देशों में कड़े कार्बन उत्सर्जन नियम, महंगे ग्रिड शुल्क, भारी सार्वजनिक विरोध और जल-बिजली पर कानूनी पाबंदियों के कारण तकनीकी कंपनियां अब सस्ते श्रम, रियायती भूमि, उदार कर नीतियों और कमजोर पर्यावरणीय जवाबदेही वाले एशियाई बाजारों का रुख कर रही हैं।
भारत सरकार ने डेटा सेंटरों को ‘डिजिटल जीवन को शक्ति देने वाले अदृश्य इंजन’ और बुनियादी ढांचे का दर्जा देकर लाल कालीन बिछाया है, जिसके चलते अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट की 20.5 अरब डॉलर की योजना और गूगल का आंध्र प्रदेश में 15 अरब डॉलर का प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़ रहा है। हालांकि पर्यावरणविदों का आरोप है कि विकसित देश अपने कार्बन और जल पदचिह्नों को छुपाने के लिए विकासशील देशों के सीमित प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं।
डेटा सेंटर पर्यावरण को व्यापक रूप से नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिसमें सर्वरों को ठंडा रखने के लिए भूजल का बेतहाशा दोहन, दिन-रात चलने वाले कूलिंग टावरों और बैकअप डीजल जनरेटरों से निकलने वाला घातक ध्वनि और वायु प्रदूषण, और ग्रिड पर पड़ने वाला अत्यधिक लोड मुख्य है। आवासीय क्षेत्रों के ठीक बगल में स्थित इन केंद्रों से निकलने वाली निरंतर निम्न-आवृत्ति ध्वनि बुजुर्गों और बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, साथ ही संपत्ति के मूल्यों में भारी गिरावट ला रही है। आंध्र प्रदेश में गूगल की 15 अरब डॉलर की परियोजना भी वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास, जल आपूर्ति और स्थानीय संपत्तियों पर पड़ने वाले प्रभावों के चलते कड़े कानूनी और सामाजिक विरोध के घेरे में आ चुकी है।
भारत में डेटा सेंटर क्षमता का भौगोलिक वितरण भी भारी असंतुलन की कहानी बयां करता है। उद्योग आंकड़ों के अनुसार देश की कुल डेटा सेंटर क्षमता का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्सा अकेले मुंबई और नवी मुंबई क्षेत्र में केंद्रित है, जहां 40 से अधिक बड़े हाइपरस्केल डेटा सेंटर संचालित या निर्माणाधीन हैं। इसके बाद चेन्नई में लगभग 15 प्रतिशत, दिल्ली-एनसीआर में 12 प्रतिशत, बेंगलुरु में 10 प्रतिशत, हैदराबाद में 8 प्रतिशत और शेष हिस्सा पुणे और कोलकाता जैसे शहरों में फैला हुआ है।
यह विसंगति इसलिए गंभीर है क्योंकि ये वे शहर हैं जो पहले से ही चरम जल संकट और चरम मौसम की मार झेल रहे हैं। जहां एक साधारण हाइपरस्केल डेटा सेंटर प्रतिदिन लाखों लीटर पानी पी जाता है और छोटे शहरों के बराबर कई सौ मेगावाट बिजली लगातार खींचता है, वहीं उद्योग जगत के वरिष्ठ अधिकारी भी अब आवासीय इलाकों के पास इनके निर्माण पर सवाल उठाने लगे हैं।
