साढ़े तीन साल बाद पहली बार ब्याज दर बढ़ी
25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी से EMI पर दबाव
महंगाई का अनुमान भी ऊपर
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | महंगा कच्चा तेल, बढ़ती महंगाई और रुपये पर दबाव ने भारतीय रिजर्व बैंक को करीब साढ़े तीन साल बाद ब्याज दर बढ़ाने पर मजबूर किया है। मौद्रिक नीति समिति ने रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50% कर दिया। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बढ़ोतरी है। छह सदस्यीय समिति ने दर बढ़ाने के फैसले पर सर्वसम्मति जताई। साथ ही नीतिगत रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया गया, हालांकि इस बदलाव पर समिति 4-2 से बंटी रही।
RBI का फैसला ऐसे समय आया है, जब अर्थव्यवस्था मजबूत गति से बढ़ रही है, लेकिन महंगाई का जोखिम लगातार बढ़ा है। केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए GDP वृद्धि का अनुमान 6.7% से बढ़ाकर 7.1% किया है। जून तिमाही में वृद्धि दर 7.8% रही। वहीं FY27 के लिए CPI महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.2% कर दिया गया है और तीसरी तिमाही में यह करीब 6% तक पहुंच सकती है। यानी RBI के सामने इस बार विकास को सहारा देने से ज्यादा चुनौती कीमतों के दबाव को नियंत्रित रखने की है।
सबसे बड़ा जोखिम कच्चे तेल से है। ब्रेंट क्रूड करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंचने से भारत का आयात बिल, रुपये पर दबाव और आयातित महंगाई बढ़ सकती है। RBI ने अल नीनो को भी खाद्य महंगाई के संभावित जोखिम में रखा है। महंगा तेल पेट्रोल-डीजल से आगे परिवहन, उत्पादन, बिजली और दूसरी वस्तुओं की लागत को प्रभावित कर सकता है।
रेपो रेट बढ़ने का सीधा असर कर्ज की लागत पर पड़ेगा। फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, ऑटो लोन और कॉरपोरेट कर्ज महंगे हो सकते हैं, जिससे EMI पर दबाव आएगा। रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल और NBFC जैसे ब्याज-संवेदनशील क्षेत्रों पर असर अपेक्षाकृत ज्यादा होगा। पहली बार घर खरीदने वाले तथा EWS और LIG वर्ग के खरीदार ज्यादा संवेदनशील रहेंगे। डेवलपर्स की पूंजी लागत भी बढ़ सकती है, हालांकि मजबूत आवास मांग और त्योहारी सीजन से गतिविधि को सहारा मिल सकता है।
दर बढ़ाने का फैसला बैंकिंग सिस्टम में घटती अतिरिक्त तरलता के बीच आया है। अतिरिक्त नकदी करीब ₹10.5 लाख करोड़ से घटकर लगभग ₹5 लाख करोड़ रह गई है। RBI ने ऐसे में आक्रामक सख्ती के बजाय सीमित बढ़ोतरी का रास्ता चुना है। आगे त्योहारी सीजन की नकदी मांग और तरलता की स्थिति अगली नीति के लिए अहम संकेत रहेंगी।
ऊंची घरेलू दरें रुपये वाली परिसंपत्तियों का रिटर्न बढ़ाकर रुपये को कुछ सहारा दे सकती हैं और आयातित महंगाई का दबाव घटा सकती हैं। हालांकि डॉलर, अमेरिकी ब्याज दरें, तेल की कीमत और विदेशी पूंजी प्रवाह अब भी रुपये की दिशा तय करेंगे।
अब RBI की अगली परीक्षा तेल और महंगाई के आंकड़ों की है। बाजार में दिसंबर में एक और 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की अटकलें हैं, लेकिन यह केंद्रीय बैंक का मार्गदर्शन नहीं है। अगर तेल महंगा बना रहा और महंगाई का दबाव बढ़ा, तो 5.50% पर ठहरना मुश्किल होगा; राहत मिलने पर RBI के पास रुकने की गुंजाइश होगी। यानी अगली दर बढ़ोतरी का रास्ता अब सीधे कच्चे तेल और महंगाई के आंकड़े तय करेंगे।
