ED की 4 राज्यों में छापेमारी, 40 सरकारी कंपनियों से ठगी
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड में चल रहे एक बड़े फर्जीवाड़े और मनी लॉन्ड्रिंग सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने 12वीं पास एक फर्जी डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह और उसके सहयोगियों के खिलाफ महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और दिल्ली-एनसीआर में 8 ठिकानों पर व्यापक छापेमारी की। तलाशी के दौरान करीब 21 लाख रुपये नकद, आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल उपकरण जब्त किए गए हैं।
जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क के जरिए देश भर की कम से कम 40 सरकारी कंपनियों (PSUs) और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर लगभग 200 करोड़ रुपये का सीएसआर फंड हासिल कर उसकी बड़े पैमाने पर हेराफेरी की गई।
ईडी के मुताबिक, आरोपी धर्मेंद्र कुमार चंद्रदेव सिंह के पास कोई मान्यता प्राप्त मेडिकल डिग्री या मेडिकल काउंसिल का पंजीकरण नहीं है और वह केवल 12वीं कक्षा तक पढ़ा है। इसके बावजूद उसने लगभग तीन दशकों तक खुद को ‘डॉक्टर’ बताकर लोगों और संस्थानों को गुमराह किया। इसी फर्जी साख का फायदा उठाकर उसने स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने के नाम पर कई चैरिटेबल ट्रस्ट और संस्थाएं खड़ी कीं।
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि जब सरकारी अस्पतालों या स्वास्थ्य संस्थानों को महंगे मेडिकल उपकरण खरीदने के लिए फंड की कमी होती थी, तो उन्हें संबंधित इलाके के जनप्रतिनिधियों से संपर्क कराया जाता था। इसके बाद इन जनप्रतिनिधियों और उनके स्टाफ की सिफारिशों के दम पर पीएसयू और बैंकों से आरोपी के ट्रस्टों को सीएसआर फंड आवंटित कराया जाता था।
जांच एजेंसी के अनुसार, सीएसआर का यह पूरा ढांचा नंबर एक के पैसे को काले धन में बदलने का जरिया बन चुका था। फंड मिलने के बाद अस्पतालों के प्रोजेक्ट या तो अधूरे छोड़े गए या फंड के अनुपात में काम ही नहीं हुआ। वेंडरों के फर्जी और बढ़ा-चढ़ाकर बिल बनाए गए और अतिरिक्त रकम को शेल (फर्जी) कंपनियों के जरिए ठिकाने लगाया गया, जिनमें से कई फर्में पहले से जीएसटी फ्रॉड में चिह्नित हैं।
वहीं निजी कंपनियों से मिले सीएसआर फंड में से अपना कमीशन काटकर बाकी बड़ी रकम उन्हें नकद में वापस लौटा दी जाती थी। इस पूरे गोरखधंधे में दलालों, ट्रस्टियों और सप्लायर्स को मोटा कमीशन दिया जाता था। जुहू पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू हुई इस जांच में 200 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन का पता चला है और एजेंसी मामले में आगे की कड़ियां जोड़ रही है।
