जंतर-मंतर से आजाद मैदान तक गूंजते नारे: क्या चेहरों के इस्तीफे की जिद में फिर दम तोड़ देगा संस्थागत सुधार?
संसद से सड़क तक टकराव, दिल्ली में गिरफ्तारियां और मुंबई में लामबंदी
किसान आंदोलन से लेकर सीएए और छात्र आक्रोश के इतिहास के बीच सबसे बड़ा सवाल-क्या व्यवस्था बदलेगी या केवल सुर्खियां?
जंतर-मंतर से लेकर आजाद मैदान तक गूंजते इस्तीफे के नारे, संसद में कार्यस्थगन प्रस्ताव और वैनों में ठूंसे जाते प्रदर्शनकारी- भारतीय राजनीति की यह चिर-परिचित नौटंकी एक बार फिर परदे पर है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के इस्तीफे की मांग को लेकर गरमाया माहौल दरअसल उस राजनीतिक पाखंड का सटीक उदाहरण है, जहां संवैधानिक प्रक्रियाओं की समझ पर सड़कों का शोर हावी कर दिया जाता है।
विपक्ष भली-भांति जानता है कि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत किसी सीईसी को पद से हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग की दरकार होती है। जब यह संख्याबल विपक्ष के पास नहीं है, तो फिर इस्तीफे की यह जिद एक सुनियोजित राजनीतिक स्वांग के सिवा और क्या है? टीवी बहसों और नारों के शोर से इतर कड़वा सवाल यह है कि क्या यह उबाल भी सत्ता-विपक्ष की सुविधापरक नूराकुश्ती की भेंट चढ़ जाएगा, या फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं के पुनरुद्धार की कोई ठोस इबारत लिखेगा?
2014 के बाद के जनांदोलनों का रिकॉर्ड गवाह है कि सड़क पर क्षणिक गुस्सा भड़काना जितना आसान है, उसे स्थायी संस्थागत सुधार में बदलना उतना ही दुष्कर। सबसे बड़ा उदाहरण देश का ऐतिहासिक किसान आंदोलन है। साल भर से अधिक समय तक सीमाओं की घेराबंदी, सैकड़ों शहादतों और भारी राजनीतिक दबाव के बाद तीनों कानून वापस कराकर किसानों ने एक सामयिक (टैक्टिकल) जीत तो हासिल कर ली, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और स्वामीनाथन आयोग की मूल नीतिगत लड़ाई हार गए। नतीजा यह रहा कि आंदोलन व्यवस्था में कोई दूरगामी आर्थिक सुधार करने के बजाय केवल असहाय ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बहाल करने पर बिखर गया।
यही हश्र 2014 के बाद के तमाम सड़क-संघर्षों का रहा। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में महीनों चले धरने अंततः नियमों की अधिसूचना के साथ फाइलों और मुकदमों में दब गए। सेना में भर्ती के खिलाफ हुआ उग्र ‘अग्निपथ आंदोलन’ चंद हफ्तों में प्रशासनिक सख्ती के आगे बेदम हो गया। वहीं NEET और UGC-NET धांधली पर छात्रों का जो अभूतपूर्व आक्रोश फूटा था, वह सीबीआई जांच की भूलभुलैया में गुम हो चुका है; परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही का कोई स्थायी तंत्र आज तक नहीं बना।
इन तमाम विफलताओं की एक तयशुदा राजनीतिक पटकथा है: पहले जनभावनाओं का दोहन कर भीड़ जुटाई जाती है, फिर विपक्ष उस पर सवार होकर अपनी खोई चुनावी जमीन तलाशने की कोशिश करता है, और अंततः सत्ता पक्ष जांच समितियों व अदालती प्रक्रियाओं का जाल बुनकर आंदोलन को थका देता है।
सबसे बड़ी विडंबना विपक्ष का चयनात्मक आक्रोश (Selective Outrage) है- जहां चुनावी जीत मिलती है, वहां यही संस्थाएं पारदर्शी मान ली जाती हैं; और जहां हार का सामना होता है, वहां समूची संवैधानिक मशीनरी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यह दोहरा रवैया जनता के बीच आंदोलन की नैतिक साख को खत्म कर देता है।
आज चुनाव आयोग को लेकर जारी टकराव भी व्यक्ति-केंद्रित होकर अपनी दिशा भटक चुका है। असली लड़ाई किसी अफसर के बने रहने या हटने की नहीं, बल्कि उस संस्थागत ढांचे की है जिसे 2023 के नए मुख्य चुनाव आयुक्त अधिनियम ने कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण में ला दिया है। जब तक चयन समिति में संतुलन और न्यायिक निगरानी की बहाली की बात नहीं होगी, तब तक ज्ञानेश कुमार की जगह कोई दूसरा नाम आने से भी तंत्र की स्वायत्तता बहाल नहीं हो सकती।
बुनियादी सवाल सड़क पर खड़े नेतृत्व से पूछे जाने चाहिए:
क्या यह विरोध मतदाता सूचियों के पारदर्शी व स्वतंत्र डिजिटल ऑडिट की वैधानिक गारंटी के लिए कोई विधायी मसौदा पेश कर रहा है?
क्या चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में निष्पक्ष संतुलन और आचार संहिता के चयनात्मक इस्तेमाल पर कोई नीतिगत जवाबदेही तय हो रही है?
या फिर यह समूचा ड्रामा कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंस, टीवी टीआरपी और सोशल मीडिया ट्रेंड्स के बाद अगले चुनावी चक्र तक ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
लोकतंत्र में किसी आंदोलन की सार्थकता संसद ठप करने या गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से आंकी जाती है कि उसने व्यवस्था को सत्ता के मनमानेपन से कितना सुरक्षित किया। यदि संघर्ष का चरम सिर्फ एक कुर्सी खाली कराना है, तो यह घोर वैचारिक कंगाली है; क्योंकि व्यक्ति बदलते हैं, प्रणालियां नहीं।
चुनावी समीकरण बदलेंगे और जंतर-मंतर से लेकर आजाद मैदान तक की भीड़ भी छंट जाएगी; फैसला इस बात से होगा कि यह आंदोलन संस्थागत जवाबदेही पर कोई स्थायी संवैधानिक नजीर छोड़ता है, या फिर बीते दशक के विफल जन-उभारों की फेहरिस्त में शामिल एक और विस्मृत नारा बनकर रह जाता है।
