मेट्रो स्टेशनों पर अस्थायी पाबंदी, इंटरनेट बंदी पर विवाद
विपक्ष का 12 अक्टूबर को फिर आंदोलन का ऐलान
सीईसी के खिलाफ महाआंदोलन से पहले दिल्ली अभूतपूर्व छावनी में तब्दील
‘इंडिया’ गठबंधन ने राष्ट्रपति से मिलकर पिछले दो वर्षों के विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग की
✍️प्रहरी संवाददाता, नई दिल्ली | मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन को लेकर शनिवार को दिल्ली में व्यापक सुरक्षा बंदोबस्त किए गए। जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेडिंग और पुलिस कार्रवाई के बीच बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। मीडिया रिपोर्टों में हिरासत का आंकड़ा 2,000 से अधिक बताया गया है। विपक्ष ने कार्रवाई की आलोचना की है, जबकि पुलिस ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबंधों को जरूरी बताया।
सुरक्षा व्यवस्था के तहत मध्य दिल्ली के जनपथ-कर्तव्य पथ क्षेत्र में 9 अक्टूबर रात 10 बजे से 10 अक्टूबर रात 10 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित रहीं। दिल्ली मेट्रो ने सुरक्षा कारणों से कई स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार अस्थायी रूप से बंद किए। अलग-अलग मीडिया रिपोर्टों में प्रभावित स्टेशनों की संख्या अलग-अलग बताई गई। हालांकि, शनिवार रात 10 बजे सभी मेट्रो स्टेशनों के गेट खोलने की घोषणा कर दी गई। नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर भी कुछ मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के परिचालन पर अस्थायी पाबंदियां लगाई गईं। दिल्ली आने-जाने वाली 200 से अधिक ट्रेनें रद्द होने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती।
इस बीच, विरोध प्रदर्शन और सार्वजनिक परिवहन पर पाबंदियों का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेट्रो और रेल सेवाओं पर व्यापक रोक अदालत के निर्देशों के विपरीत थी। याचिका पर रविवार, 11 अक्टूबर को सुबह 10:30 बजे सुनवाई है। अदालत में सुनवाई के दौरान प्रतिबंधों के दायरे और प्रशासन की कार्रवाई पर उठाए गए सवालों पर विचार किया जा सकता है।
इस बीच, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) ने भी प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने पर चिंता जताई। हालांकि भारत ने इन टिप्पणियों को अनुचित बताते हुए अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करार दिया।
विपक्षी दल SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग कर रहे हैं। निर्वाचन आयोग और भाजपा इन आरोपों को खारिज करते रहे हैं। मतदाता सूची में कथित हेरफेर तथा पिछले दो वर्षों के विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना उन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
