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बहुमत के बावजूद महायुति की बढ़ी बेचैनी
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22 जनवरी को खुलेगा मुंबई के पहले नागरिक का भाग्य
✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, मुंबई | बृहन्मुंबई महानगर पालिका के चुनाव नतीजों के बाद मुंबई की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां संख्याबल से ज्यादा किस्मत की भूमिका अहम हो गई है। 2026 के बीएमसी चुनाव में भले ही भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो और महायुति के खाते में कुल 118 सीटों का स्पष्ट बहुमत दर्ज हो, लेकिन महापौर की कुर्सी का फैसला अब 22 जनवरी को मंत्रालय में निकलने वाली आरक्षण लॉटरी पर टिका है। यही लॉटरी तय करेगी कि मुंबई का पहला नागरिक कौन होगा।
आरक्षण का दांव और उद्धव ठाकरे की रणनीति
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि अगर महापौर पद अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए आरक्षित हो गया, तो सत्ता का गणित पूरी तरह पलट सकता है। मौजूदा सदन में ST वर्ग से केवल दो ही पार्षद निर्वाचित हुए हैं और दोनों ही शिवसेना (UBT) के टिकट पर जीतकर आए हैं। ऐसे में बहुमत से दूर होने के बावजूद उद्धव गुट के पास निर्विरोध महापौर बनाने का रास्ता खुल सकता है। यही वजह है कि उद्धव ठाकरे के हालिया बयान- “अगर भगवान की इच्छा हुई, तो महापौर हमारा ही होगा” – को सियासी संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
बहुमत बनाम भाग्य की लड़ाई
दूसरी ओर, महायुति के पास संख्या का मजबूत आधार है, लेकिन एसटी वर्ग में एक भी निर्वाचित पार्षद नहीं। यदि आरक्षण ओबीसी या सामान्य वर्ग के लिए घोषित होता है, तो सत्ता का पलड़ा स्वाभाविक रूप से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन की ओर झुक जाएगा। पिछले कार्यकाल में महापौर पद सामान्य (महिला) के लिए आरक्षित था, ऐसे में इस बार एससी, एसटी या ओबीसी में से किसी एक वर्ग की बारी मानी जा रही है।
देश की सबसे अमीर महानगरपालिका कही जाने वाली बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन की कमान किसके हाथ आएगी, इसका फैसला अब वोटों से ज्यादा एक पर्ची करेगी। 22 जनवरी की सुबह मुंबई की राजनीति के लिए निर्णायक साबित होने जा रही है।
