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10 साल में 89,441 सरकारी स्कूलों पर लटका ताला: UP-MP में सबसे बुरा हाल, प्राइवेट स्कूलों की आई बाढ़

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  • लोकसभा में पेश UDISE+ आंकड़ों ने खोली पोल

  • देश के दो बड़े राज्यों ने गंवाए 60% स्कूल

  • शिक्षा के निजीकरण का खतरनाक ट्रेंड

✍️ वरिष्ठ संवाददाता, मुंबई/नई दिल्ली | लोकसभा के पटल पर रखे गए शिक्षा मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों ने देश की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की एक विचलित करने वाली तस्वीर प्रस्तुत की है। पिछले एक दशक (2014-15 से 2023-24) के दौरान भारत के शैक्षिक मानचित्र से 89,441 सरकारी स्कूल या तो पूरी तरह गायब हो गए हैं या उन्हें ‘रेशनलाइजेशन’ के नाम पर दूसरे संस्थानों में विलीन कर दिया गया है।
आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जहाँ एक ओर सरकारी स्कूलों की संख्या 11,07,101 से घटकर 10,17,660 पर सिमट गई है, वहीं इसी अवधि में निजी शिक्षण संस्थानों के नेटवर्क में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है।

शिक्षा मंत्रालय के ‘यूडीआईएसई+’ (UDISE+) डेटा के अनुसार, इस गिरावट का सबसे भयावह प्रभाव हिंदी भाषी राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में देखा गया है। इन दोनों राज्यों ने मिलकर देश भर में हुई कुल कमी का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा साझा किया है।

मध्य प्रदेश इस सूची में शीर्ष पर है, जहां 29,410 सरकारी स्कूलों का अस्तित्व समाप्त हो गया। वहीं, उत्तर प्रदेश में 25,126 सरकारी स्कूल कम हुए हैं। गौर करने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश में जहां सरकारी तंत्र पीछे हटा, वहां निजी क्षेत्र ने तेजी से पैठ बनाई है। इस एक दशक में देश भर में खुले 42,944 नए निजी स्कूलों में से अकेले उत्तर प्रदेश का योगदान 19,305 रहा, जो कुल राष्ट्रीय वृद्धि का लगभग 45 प्रतिशत है।

महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक रूप से विकसित राज्य में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। यहां अंग्रेजी माध्यम के प्रति बढ़ते आकर्षण ने स्थानीय भाषा के स्कूलों के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। आंकड़ों के अनुसार, महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के दर्जनों स्कूल बंद हो चुके हैं और सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं, जहां छात्रों की संख्या शून्य या दहाई के आंकड़े से भी कम रह गई है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने इन बंदियों और विलय की प्रक्रिया को संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और ‘युक्तिकरण’ का नाम दिया है। आधिकारिक तर्क यह है कि जिन स्कूलों में नामांकन 10 छात्रों से भी कम रह गया था, उन्हें निकटतम बड़े स्कूलों में मर्ज कर दिया गया ताकि शिक्षकों और बुनियादी ढांचे का बेहतर उपयोग हो सके।

हालाँकि, धरातल पर इस नीति का प्रभाव ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए ‘शिक्षा के अधिकार’ की राह में बाधा बनकर उभरा है। स्कूल बंद होने से छात्रों को अब लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे प्राथमिक स्तर पर ‘ड्रॉप-आउट’ दर बढ़ने की आशंका प्रबल हो गई है।

आंकड़ों का यह ट्रेंड साफ तौर पर संकेत देता है कि देश की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का ढांचा धीरे-धीरे सरकारी नियंत्रण से बाहर होकर निजी हाथों की ओर खिसक रहा है। जहां एक तरफ सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन को आधार बनाकर ताले लटकाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर निजी स्कूलों की संख्या में हुई भारी बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि शिक्षा की मांग कम नहीं हुई है, बल्कि अभिभावकों का भरोसा सरकारी व्यवस्था से टूटकर निजी संस्थानों की ओर मुड़ रहा है।


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