✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, मुंबई | महाराष्ट्र की 29 महानगर निगमों में मेयर पद के आरक्षण को लेकर जारी सस्पेंस गुरुवार को आधिकारिक लॉटरी के साथ समाप्त हो गया, लेकिन इसके साथ ही सियासी टकराव भी खुलकर सामने आ गया। राज्य सरकार की ओर से मंत्रालय में कराई गई आरक्षण लॉटरी में यह तय हुआ कि मुंबई और पुणे समेत 9 नगर निगमों में मेयर पद महिला वर्ग के लिए आरक्षित रहेगा, जबकि 8 नगर निगमों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को मेयर की कुर्सी मिलेगी। शेष नगर निगमों में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और खुला वर्ग के लिए आरक्षण घोषित किया गया है।
लॉटरी प्रक्रिया नगर विकास विभाग के नियमों के अनुसार चक्रीय (रोटेशन) प्रणाली पर आधारित रही। मंत्रालय की छठी मंज़िल स्थित परिषद सभागृह में सुबह 11 बजे सभी आरक्षण श्रेणियों की पर्चियां पारदर्शी बॉक्स में डालकर ड्रॉ निकाला गया। सरकारी अधिकारियों के मुताबिक पूरी प्रक्रिया निर्धारित अधिसूचना और नियम पुस्तिका के तहत पूरी पारदर्शिता के साथ संपन्न की गई।
हालांकि, इस फैसले पर उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना (यूबीटी) ने कड़ा विरोध दर्ज कराया। पार्टी ने लॉटरी प्रक्रिया का बहिष्कार करते हुए आरोप लगाया कि यह आरक्षण “सत्ताधारी दलों की संख्यात्मक स्थिति को ध्यान में रखकर” तय किया गया है। शिवसेना यूबीटी नेताओं का दावा है कि इस प्रक्रिया में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और OBC वर्गों के साथ अन्याय हुआ है और आरक्षण का संतुलन बिगाड़ा गया है।
सबसे अधिक चर्चा बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) को लेकर रही, जहां महिला आरक्षण घोषित होने के बाद राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। देश की सबसे समृद्ध नगर निगम होने के कारण बीएमसी का मेयर पद राजनीतिक प्रतिष्ठा का केंद्र माना जाता है। हालिया चुनावों में बदले समीकरणों के बीच अब सभी दल महिला पार्षदों में से संभावित मेयर उम्मीदवारों की तलाश में जुट गए हैं।
आरक्षण लॉटरी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महाराष्ट्र की शहरी राजनीति में आने वाला कार्यकाल महिला और OBC नेतृत्व की अहम भूमिका के साथ-साथ तीखे राजनीतिक संघर्ष का भी गवाह बनने वाला है।
