राहुल ने कहा- किसानों के खिलाफ ‘मौत का आदेश’ मोदी सरकार ने लोकतंत्र को किया शर्मसार
नई दिल्ली। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि कृषि क्षेत्र सुधार बिलों पर संसद की मंजूरी ने किसानों के खिलाफ मौत का आदेश पर मुहर लगा दी है। राहुल ने एक तस्वीर सांझा करते हुए कहा, कृषि कानून हमारे किसानों के लिए मौत की सजा है। उनकी आवाज को संसद और बाहर कुचल दिया जाता है। यहां इस बात का प्रमाण है कि भारत में लोकतंत्र मर चुका है।”
विपक्षी नेताओं की मांग अनसुनी
बता दें कि विपक्षी सदस्यों द्वारा भारी हंगामे के बीच, राज्यसभा ने रविवार को किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक, 2020, और मूल्य आश्वासन और फार्म सेवा विधेयक, 2020 के किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) समझौते को पारित किया। गुरुवार को लोकसभा में यह बिल पारित किए जा चुके थे। राष्ट्रपति ने भी तीनों कृषि संशोधन बिल पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। यह बिल अब कानून का रूप अख्तियार कर लेगा।
सरकार का घमंड खून के आंसू निकालेगी
इससे पहले भी गांधी ने ट्वीट में कहा था कि “लोकतंत्र शर्मसार है” क्योंकि सरकार ने “राज्यसभा में किसानों के खिलाफ मौत के आदेश निकाले”। गांधी ने ट्वीट किया, “जो किसान धरती से सोना उगाता है, मोदी सरकार का घमंड उसे ख़ून के आँसू रुलाता है। राज्यसभा में आज जिस तरह कृषि विधेयक के रूप में सरकार ने किसानों के ख़िलाफ़ मौत का फ़रमान निकाला, उससे लोकतंत्र शर्मिंदा है।”
काला कानून है मौजूदा कृषि बिल
राहुल गांधी ने कृषि बिल को “मोदी सरकार के कृषि विरोधी काले कानून” की संज्ञा दी। उन्होंने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया कि वे खेत से संबंधित बिलों को लाकर “किसानों को कैदियों के दास होने” की अनुमति दे रहे हैं। उन्होंने सवाल किया, मोदी सरकार के कृषि-विरोधी ‘काले क़ानून’ से किसानों को: 1. APMC/किसान मार्केट ख़त्म होने पर MSP कैसे मिलेगा? 2. MSP की गारंटी क्यों नहीं? मोदी जी किसानों को पूँजीपतियों का ‘ग़ुलाम’ बना रहे हैं जिसे देश कभी सफल नहीं होने देगा।
बीजेपी ने सराहा
इस बीच, बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा और पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने रविवार को संसद के दो कृषि संबंधी बिलों का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि किसानों को अपनी उपज बेचने में और बिचौलियों से छुटकारा पाने की स्वतंत्रता दी जाएगी। नड्डा ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और कृषि उपज बाजार समितियां (एपीएमसी) तब भी जारी रहेंगी जब किसानों को इन बिलों के तहत अधिक और बेहतर विकल्प मिलेंगे।

