दोस्तोवस्की ने जीसस को अपनी एक कहानी में वापस लौटाया है। दोस्तोवस्की का एक उपन्यास है: ब्रदर्स कर्माझोव। बड़ा बहुमूल्य है। अठारह सौ साल बीत गए हैं। और जीसस ने सोचा कि अब तो आधी दुनिया ईसाई हो गई, अब मैं वापस जाऊं। अब मेरा स्वागत हो सकेगा। मैं जरा समय के पहले पहुंच गया था। लोग तैयार ही न थे। अब तो गांव-गांव मेरे चर्च हैं। घर-घर बाइबिल है। कंठ-कंठ में मेरा क्रास लटका है। लाखों मेरे पंडित-पुरोहित हैं। अरबों की संख्या हो गई है मेरे मानने वालों की। अब वक्त आया ठीक। मौसम अब है। अब मुझे जाना चाहिए।
तो वे उतरे बेथलहम के छोटे से गांव में, जहां उनका पहले जन्म हुआ था। उन्होंने रविवार का दिन चुना। क्योंकि बाकी दिन तो ईसाई ईसाई होते नहीं, रविवार के दिन ही होते हैं। छह दिन तो कोई ईसाई होता नहीं। बाजार में सब शोषक हैं। छठवें दिन काम-धंधा बंद करके, साफ-सुथरे कपड़े पहन कर लोग चर्च पहुंच जाते हैं, ईसाई हो जाते हैं, परमात्मा का गीत गाते हैं।
जीसस रविवार के दिन बेथलहम के बाजार में एक वृक्ष के नीचे आकर खड़े हो गए चर्च के सामने ही। सोचा था, अब तो लोग पहचान लेंगे। पहले तो जब मैं आया था, मुझे चिल्ला-चिल्ला कर कहना पड़ा कि मैं परमात्मा का संदेशवाहक हूं। फिर भी लोगों ने माना नहीं। अब तो लोग खुद ही पहचान लेंगे। अब तो किसी को बताना नहीं है। वे चुपचाप खड़े रहे।
भीड़ इकट्ठी हो गई बाजार में। आवारा लड़के पत्थर फेंकने लगे, लोग हंसने लगे। किसी आदमी ने खिलखिला कर कहा कि रूप तो बिलकुल जीसस जैसा ही बनाया है। मगर जल्दी करो, भाग जाओ यहां से। अगर पुलिस को पता चल गया, मुसीबत में पड़ोगे। और फिर जल्दी ही पुरोहित आने वाला है। चर्च की प्रार्थना पूरी होने के करीब है। अगर पुरोहित को पता चल गया तो झंझट में पड़ोगे। हथकड़ी पड़ जाएंगी। क्योंकि ऐसा नाटक नहीं चलेगा।
जीसस ने कहा, मैं नाटक नहीं कर रहा हूं। मैं जीसस हूं!
लोगों ने कहा, वाह खूब रही! नाटक भी खूब कर रहे हो और दिमाग भी खराब मालूम होता है। भाग जाओ समय रहते!
जीसस थोड़े डरे भी, चिंतित भी हुए कि यह मामला क्या है! लेकिन सोचा कि शायद ये लोग ईसाई नहीं हैं। ईसाई तो चर्च गए हुए हैं।
चर्च से भीड़ आई तो भीड़ ने तो फौरन जीसस को बहुत डांटा-डपटा। वहां पूजा करके आ रहे थे। वहां जीसस सूली पर लटके हैं मुर्दा! यहां जिंदा आदमी खड़ा है। बहुत डांटा-डपटा कि यह ठीक नहीं है। यह अपमान है हमारे भगवान का। उतरो नीचे वृक्ष के और ये कपड़े बदलो।
पर जीसस ने इधर-उधर देखा कि शायद पुरोहित तो पहचान लेगा। वर्षों अध्ययन किया है, आंखें फोड़ी हैं बाइबिल पर। मेरे ही गुणगान किए हैं। वह तो कम से कम पहचान लेगा। ये लोग तो श्रावक हैं। ये शायद न पहचान पाएं।
तब पुरोहित आया। लोगों ने जल्दी रास्ता दे दिया, झुक-झुक कर नमस्कार किया। ईसा को बड़ी हैरानी हुई। कोई मुझे झुक कर नमस्कार नहीं कर रहा है। मेरे पुरोहित को, जिसके गले में मेरा क्रास लटका है, उसको लोग झुक-झुक कर नमस्कार किए।
पुरोहित नीचे आया और उसने कहा कि नीचे उतर! यह शरारत यहां न चलेगी।
तब तो जीसस को बड़ा धक्का लगा कि यह तो मुझे पहचानता नहीं। मेरा ही नौकर, मेरा ही पुजारी! वे नीचे उतर गए। लोगों ने उन्हें घेर लिया और चर्च की तरफ ले गए। चर्च में अंदर जाकर जीसस को एक कोठरी में बंद कर दिया। आधी रात…जीसस सोचते रहे कि यह क्या फिर से फांसी लगेगी? यह तो सब मामला वैसा ही का वैसा है। कुछ भी बदला नहीं।
इस दुनिया में कभी कुछ बदलता नहीं। सब वैसा ही का वैसा है। महावीर आते हैं, बुद्ध आते हैं, जीसस आते हैं, चले जाते हैं। लोगों के अज्ञान पर लकीर भी नहीं खिंचती। वे फिर अपनी नींद में लीन हो जाते हैं। थोड़ी देर डगमगा गए थे, थोड़ी गड़बड़ की इन लोगों ने। वे कहते हैं, अब चलो सब शांति है। फिर से सो जाओ।
आधी रात जीसस जागे हैं, अंधेरे में बैठे हैं, सोचते हैं कि यह तो व्यर्थ हुआ। और तब तो मैं सोचता था कि यहूदी हैं जिन्होंने मुझे सूली दी। अब तो ये ईसाई हैं। अपने ही लोग अब मुझे मारेंगे? यह तो और भी बेहूदी बात हो गई। तब तो कुछ समझ में भी आता था कि विपरीत थे, दूसरे धर्मीय थे। अब तो अपने धर्म के लोग हैं।
तब आधी रात द्वार खुला, पुरोहित भीतर आया दीया लेकर, दीया उसने रखा, गिर पड़ा जीसस के चरणों में। जीसस ने कहा, यह तुम क्या कर रहे हो? सुबह तो तुमने ऐसा दुर्व्यवहार किया!
उसने कहा, आपसे साफ बात कह दूं। मैं पहचान गया। आंखें ऐसे ही व्यर्थ खराब नहीं की हैं। जीवन भर तुम्हारे ही गीत गाने में बिताया, तुम्हें न पहचानूंगा? लेकिन बाजार में पहचानने की बात मत करो। भीड़-भाड़ में नहीं पहचान सकता हूं। और तुमसे हमारी इतनी ही प्रार्थना है कि आपकी कोई भी जरूरत नहीं है। काम सब ठीक चल रहा है। हम अच्छी तरह चला रहे हैं। तुम्हारे आने से फिर उपद्रव होगा। क्योंकि तुम सदा के उपद्रवी हो। बगावत तुम्हारे खून में है।
उस पुरोहित ने जरूर बड़ी महत्वपूर्ण बातें कहीं।
तुम न आओ। नहीं तो तुम्हें फिर फांसी लगेगी। और हमें पीड़ा होगी तुम्हें फांसी देने में, लेकिन देनी पड़ेगी। क्योंकि या तो तुम बचोगे या चर्च बचेगा। दोनों साथ नहीं बच सकते। अगर तुम बचे तो चर्च नष्ट हो जाएगा। यह हमने जो अठारह सौ साल में इतना फैलाव किया है, यह जो इतना बड़ा हमने विस्तार किया है, सब मिट्टी में मिला दोगे तुम।
तुम्हारी शिक्षाएं ठीक हैं प्रवचन देने के लिए; मानने के लिए बड़ी खतरनाक हैं। और हमने इतना धन, इतनी संपदा, इतने चर्च सब खड़े किए हैं। यह कोई तुम्हारी शिक्षा मान कर नहीं चल सकता था कि जो तुम्हारे एक गाल पर चांटा मारे उसके सामने तुम दूसरा गाल कर दो। अगर ऐसा हम करते तो यह सब लुट जाए। इसके लिए ताकत चाहिए।
तुम्हारी शिक्षा बड़ी सुंदर है, लेकिन संसार के लिए नहीं है। वह साधुपुरुषों के लिए है। हमने तुम्हें पहचान लिया था सुबह भी, लेकिन मजबूरी है। हमें मजबूर मत करो। तुम्हारी कृपा होगी, तुम यहीं से विदा हो जाओ। यह बात आगे न बढ़े। अन्यथा अपने ही लोगों के हाथ तुम्हें सूली झेलने की तैयारी हो तो तुम्हारी मर्जी।
#ओशो
