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ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था, चवन्नी की ज़िंदगी

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भारत का GDP बढ़ा, मगर लोगों का जीवन घटता गया

भारत ने 2025 में जापान को पीछे छोड़ते हुए $4.187 ट्रिलियन की GDP दर्ज कर ली। यह खबर अख़बारों की पहली हेडलाइन बनी, टीवी स्टूडियो में उत्सव की मुद्रा में एंकर चीख़ते दिखे, और सोशल मीडिया पर इसे ‘आर्थिक महाशक्ति’ बनने की सीढ़ी बताया गया। लेकिन, इस चमकते आंकड़े के पीछे जो सच्चाई छिपी है, वह कहीं अधिक कड़वी, और कहीं अधिक चिंताजनक है।

सुबह से ढोल पीटे जा रहे हैं कि 4.187 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनकर हम तीसरे नंबर पर पहुंच गए। देश में सरकारी विज्ञापन के पोस्टर बदलने लगे, टेलीविज़न पर ‘आर्थिक क्रांति’ की नई गाथा शुरू हो गई। लेकिन, इस महाकाव्य में आम आदमी नायक नहीं, एक मूक दर्शक है, जिसकी जेब खाली है, पेट आधा भरा और भविष्य धुंधला।

इस ‘विकास’ का असली चेहरा प्रति व्यक्ति आय के आंकड़े  उघाड़ देते हैं। जापानी नागरिक साल में $33,900 कमाता है, भारतीय सिर्फ़ $2,880। मतलब हम जनसंख्या के बल पर आंकड़ों को ऊपर खींच लाए, लेकिन नागरिक की ज़िंदगी को ऊपर नहीं उठा पाए।

सरकार GDP को जैसे ओलंपिक मेडल की तरह टांग रही है, जैसे किसी खिलाड़ी ने दौड़ जीत ली हो। पर क्या यह वही देश नहीं है, जहां ग्रामीण महिलाएं प्रसव के लिए 15 किलोमीटर पैदल चलती हैं? जहां B.Tech पास युवक खाने की डिलीवरी कर रहा है, 15 हजार रुपए में 12 – 12 घंटे अपनी जिंदगी झोंक दे रहा है कारपोरेट मालिकों के आर्थिक सेहत को मजबूत करने के लिए और जहां किसान की फसल मंडी में दम तोड़ देती है?

सरकार का ‘विकासवाद’ अब आंकड़ों की एक बाज़ीगरी बन चुका है, जहां चमकते ग्राफ़ दिखाकर अंधेरे को छिपाया जाता है। बजट में कॉरपोरेट टैक्स छूट की बहार होती है, लेकिन गरीबों के लिए ‘मुफ़्त राशन योजना’ एक स्थायी नीतिगत समाधान बन चुकी है। विकास के नाम पर बांटे जा रहे नारों ने नौजवानों की उम्मीदें और बुज़ुर्गों की पेंशन, दोनों को हाशिए पर छोड़ दिया है।

GDP तब मायने रखती है, जब वह थाली में खाना, सिर पर छत और बच्चों के हाथ में किताब लाए। वरना यह जीत वैसी ही है जैसे कोई शासक ताज तो पहन ले, पर प्रजा भूखी हो। जापान छोटा है लेकिन गरिमामय है। भारत विशाल है लेकिन असमानता की दरारों से जर्जर होता जा रहा है।

यह समय है पूछने का कि हमारी GDP कितना बढ़ी, बल्कि ये कि इससे जनता की ज़िंदगी कितनी सुधरी, कितनी बदली? क्योंकि अगर विकास सिर्फ़ विज्ञापनों तक सीमित हो गया, तो जनता के विश्वास का दिवाला ज़रूर निकल जाएगा।

 


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