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यूपी में जमीन माफिया का आतंक

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-भ्रष्ट राजस्व-पुलिस तंत्र ने बढ़ाई आम जनता की मुश्किलें
-शिकायतकर्ता ही फंसाए जा रहे हैं

 

✍🏻 डिजिटल न्यूज डेस्क, जौनपुर। उत्तर प्रदेश में हालात इस कदर बिगड़े हुए हैं कि गांव-गांव में पुलिस और राजस्व विभाग के कारण डंडा-लाठी चलना आम बात हो गई है। कागजों और सरकारी रिकॉर्ड में जमीन की हेरफेर से लेकर खुलेआम दबंगई और कब्जेदारी तक, आमजन का जीवन असुरक्षित हो गया है। हालांकि विभागों की पूरी व्यवस्था को गलत ठहराना उचित नहीं होगा, मगर कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों ने इस तंत्र को आम नागरिकों के खिलाफ एक साजिशी औजार बना डाला है। नतीजा यह है कि पीड़ित नागरिक शिकायत लेकर थानों या तहसीलों का चक्कर लगाते हैं और अंत में अदालतों की चौखट पर पहुंच जाते हैं। निचले स्तर पर कार्यरत अधिकारियों के आगे आला अधिकारी भी पस्त हैं।

जमीन से जुड़े विवादों में सबसे बड़ा खेल निचले स्तर पर हो रहा है। पटवारियों से लेकर लेखपाल और हल्का दरोगा तक, भ्रष्टाचार की यह कड़ी ऊपर तक रिश्वत की बंदरबांट के रूप में जाती है। आम ग्रामीण जब अपनी समस्या लेकर पहुंचता है तो उसे न्याय और समाधान के बजाय धमकी, झूठे मुकदमे और उल्टे फंसाए जाने का डर झेलना पड़ता है। रसूखदारों और असामाजिक तत्वों के लिए यह सिस्टम वरदान बन चुका है। वे जमीन हथियाने के लिए नेताओं, दबंगों और अधिकारियों से गठजोड़ कर गरीब व कमजोर परिवारों को बेदखल कर रहे हैं।

प्रदेश में जमीन कब्जाने का यह रैकेट इतना संगठित है कि शिकायतकर्ता को ही अपराधी बना दिया जाता है। गांव-गांव में ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे, जहां असली मालिक अपनी जमीन के कागज लेकर भटकता रहा, लेकिन कब्जा दबंगों के नाम पर चढ़ा दिया गया। थानों और चौकियों में बैठे भ्रष्ट अफसर और तहसील के गलियारों में सक्रिय बिचौलिए इस खेल के सबसे बड़े हथियार हैं।

यूपी में अदालतों में लंबित मुकदमों की भीड़ का बड़ा हिस्सा इन्हीं जमीन विवादों से जुड़ा हुआ है। वर्षों तक फैसले लटकते रहते हैं और इसी बीच भ्रष्ट अधिकारी, दलाल और नेता की तिकड़ी जमीन की कीमतों का खेल खेलती रहती है। आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई और पुश्तैनी जायदाद गंवाकर हताश हो जाता है।

राज्य सरकारें भले ही ‘भ्रष्टाचार मुक्त यूपी’ और ‘जमीन कब्जा रोकथाम अभियान’ जैसी घोषणाएं करती रही हों, लेकिन हकीकत यह है कि राजस्व और पुलिस विभाग के कुछ कारिंदों ने इस तंत्र को जमीन माफियाओं का सेवक बना दिया है। सवाल यह है कि कब तक आम जन इस भ्रष्ट गठजोड़ का शिकार बनता रहेगा और कब इन रैकेटों पर सख्ती से अंकुश लगाया जाएगा?

 

 


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