✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, नई दिल्ली | संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान गुरुवार (18 दिसंबर, 2025) को परमाणु ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े बहुचर्चित ‘द सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025’ (SHANTI विधेयक) को राज्यसभा ने ध्वनिमत से पारित कर दिया।
इससे एक दिन पहले बुधवार (17 दिसंबर) को यह विधेयक लोकसभा से भी मंजूरी पा चुका था। अब राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह कानून का रूप ले लेगा, जिसके साथ ही भारत के सिविल परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी का रास्ता औपचारिक रूप से खुल जाएगा।
सरकार का दावा है कि यह विधेयक देश की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की नींव रखता है। केंद्रीय परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में चर्चा के दौरान कहा कि परमाणु ऊर्जा 24×7 भरोसेमंद बिजली आपूर्ति का स्रोत है, जबकि सौर और पवन जैसी नवीकरणीय ऊर्जा मौसम और समय पर निर्भर रहती हैं।
सरकार का तर्क है कि निजी निवेश से नई तकनीक, पूंजी और दक्षता आएगी, जिससे स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा और भारत के कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को पूरा करने में मदद मिलेगी। साथ ही, नए नियामक ढांचे और सख्त रेडिएशन मानकों के जरिए सुरक्षा तंत्र को और मजबूत करने का दावा किया गया है।
हालांकि, विपक्ष ने इस विधेयक को लेकर गंभीर आशंकाएं जताई हैं। कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने सरकार पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए याद दिलाया कि 2008 के भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का बीजेपी ने कड़ा विरोध किया था।
विपक्ष का कहना है कि मौजूदा विधेयक उसी रास्ते को आगे बढ़ाता है, जिसका तब विरोध किया गया था। जयराम रमेश ने विशेष रूप से एटॉमिक एनर्जी एक्ट, 1962 और सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010 में प्रस्तावित बदलावों पर सवाल उठाए और कहा कि इससे सार्वजनिक क्षेत्र की भूमिका कमजोर हो सकती है।
विपक्ष का यह भी आरोप है कि निजी और विदेशी कंपनियों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया में सार्वजनिक सुरक्षा, जवाबदेही और राष्ट्रीय संप्रभुता से समझौता होने का खतरा है। उनका यह भी कहना है कि परमाणु दुर्घटनाओं की स्थिति में दायित्व तय करने की मौजूदा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है, जिसका बोझ अंततः आम नागरिकों पर आ सकता है।
सरकार जहां इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता और विकास का नया अध्याय बता रही है, वहीं संसद के भीतर यह विधेयक निजीकरण, सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर तीखी राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है।
