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भारत की नदियों में घुला जहर: WHO-UNEP रिपोर्ट में खुलासा, गंगा-यमुना बनीं AMR का हॉटस्पॉट

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  • गंगा, यमुना समेत भारत की नदियों में एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस बढ़ा

  •  72% गंदा पानी बिना ट्रीटमेंट बह रहा

✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, मुंबई | गंगा और यमुना समेत देश की कई प्रमुख नदियां अब सिर्फ प्रदूषण ही नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप लेती जा रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की ताज़ा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत की नदियां, झीलें और भूजल एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (AMR) के बड़े वाहक और स्थायी भंडार बन चुके हैं। इसका सीधा अर्थ है कि पानी में मौजूद बैक्टीरिया अब आम एंटीबायोटिक दवाओं पर असर नहीं होने दे रहे, जिससे संक्रमण का इलाज मुश्किल होता जा रहा है।

WHO-UNEP की एनवायर्नमेंटल डाइमेंशंस ऑफ एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप, जापान और उत्तरी अमेरिका में 80 से 95 प्रतिशत शहरी अपशिष्ट जल का उन्नत उपचार किया जाता है, जबकि भारत में करीब 72 प्रतिशत अपशिष्ट जल बिना किसी प्रभावी ट्रीटमेंट के सीधे नदियों, झीलों और भूजल में छोड़ दिया जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और जल शक्ति मंत्रालय के आंकड़े भी इसी स्थिति की पुष्टि करते हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि घरेलू सीवेज, औद्योगिक कचरा, अस्पतालों का डिस्चार्ज, कृषि बहाव, फार्मास्युटिकल इकाइयों से निकलने वाला अपशिष्ट और पशुपालन में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं जल स्रोतों को लगातार दूषित कर रही हैं। खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार पशुपालन, पोल्ट्री और मत्स्य पालन में एंटीबायोटिक्स का अनियंत्रित उपयोग AMR के फैलाव का बड़ा कारण है।

कई अध्ययनों में गंगा, यमुना, कावेरी, कृष्णा और गोदावरी जैसी नदियों को AMR का प्रमुख हॉटस्पॉट बताया गया है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के अनुसार, दिल्ली में बहने वाली यमुना नदी के पानी और तलछट में 139 से अधिक रेसिस्टेंस जीन पाए गए हैं। इनमें bla-NDM-1, bla-CTX-M-15 और bla-TEM-1 जैसे खतरनाक जीन शामिल हैं। अध्ययन बताता है कि 57.5 प्रतिशत ई-कोलाई स्ट्रेन कम से कम दो एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हैं, जबकि करीब 20 प्रतिशत स्ट्रेन मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट हैं।

CPCB की रिपोर्ट में यमुना के पानी में क्रोमियम और सीसा जैसी भारी धातुओं के साथ-साथ सिप्रोफ्लोक्सासिन, एम्पिसिलिन, ऑफ्लोक्सासिन और सेफ्यूरोक्सिम जैसी दवाओं के अवशेष भी पाए गए हैं। वहीं, WHO-UNEP रिपोर्ट के मुताबिक, हरिद्वार-ऋषिकेश क्षेत्र में बड़े स्नान पर्वों के दौरान गंगा में bla-NDM-1 जीन की मात्रा सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना तक बढ़ जाती है।

दक्षिण भारत में भी हालात चिंताजनक हैं। वहां की नदियां भी इस खतरे से अछूती नहीं हैं। UNEP और ICMR से जुड़े अध्ययनों के अनुसार कावेरी, कृष्णा और गोदावरी बेसिन में कृषि बहाव और शहरी अपशिष्ट के कारण प्रतिरोधी बैक्टीरिया तेजी से बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि सीवेज ट्रीटमेंट, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण और AMR निगरानी को मजबूत नहीं किया गया, तो यह संकट आने वाले वर्षों में और गहराता जाएगा।

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