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‘कंपनियां बचाने’ का कानून बना बैंकों के नुकसान का सौदा
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69% तक रकम छोड़ने को मजबूर लेनदार
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दिवालिया मामलों में बढ़ती देरी ने बढ़ाया संकट
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | देश के बैंकिंग सिस्टम को बचाने और डूबती कंपनियों को दोबारा खड़ा करने के लिए बनाया गया इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड (IBC) अब खुद सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि कर्जदार कंपनियां तो बच नहीं रहीं, लेकिन बैंकों का पैसा लगातार डूबता जा रहा है। करोड़ों नहीं, लाखों करोड़ रुपये के फंसे कर्ज के बीच बैंकों की हालत ऐसी हो गई है कि उन्हें अपने ही पैसों का बड़ा हिस्सा छोड़कर समझौता करना पड़ रहा है। रिपोर्ट बताती है कि अब तक 8,987 कंपनियां CIRP प्रक्रिया में पहुंच चुकी हैं।
केयरएज रेटिंग्स की ताजा रिपोर्ट ने IBC की जमीनी तस्वीर सामने रख दी है। मार्च 2026 तक वित्तीय लेनदारों के कुल स्वीकृत दावे 14.13 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुके हैं, लेकिन इसके मुकाबले वास्तविक वसूली केवल 4.31 लाख करोड़ रुपये ही हो सकी। यानी बैंक और वित्तीय संस्थान अपने दावों पर औसतन 69% तक का भारी ‘हेयरकट’ झेल रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक FY26 की चौथी तिमाही तक IBC के तहत औसत रिकवरी रेट घटकर सिर्फ 30.6% रह गया है। यह वही कानून है जिसे कभी भारत के बैंकिंग सेक्टर का सबसे बड़ा सुधार बताया गया था। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि कंपनियां बचने से ज्यादा खत्म हो रही हैं और बैंक वसूली से ज्यादा नुकसान दर्ज कर रहे हैं।
IBC का मूल मकसद था संकटग्रस्त कंपनियों को पुनर्जीवित करना, रोजगार बचाना और बैंकों को समयबद्ध वसूली दिलाना। लेकिन मौजूदा आंकड़े इस दावे की पोल खोलते नजर आ रहे हैं। मार्च 2026 तक कुल मामलों में केवल 15.8% मामलों का समाधान रिजॉल्यूशन प्लान के जरिए हो पाया, जबकि 33.4% मामले सीधे लिक्विडेशन में चले गए। यानी हर तीन में से एक कंपनी को बचाने के बजाय बंद कर दिया गया।
स्थिति और गंभीर इसलिए हो गई है क्योंकि IBC की तय 270 दिन की समयसीमा अब महज कागजी नियम बनकर रह गई है। रिपोर्ट बताती है कि करीब 78% मामले 270 दिनों से ज्यादा समय से लंबित हैं। कई मामलों में दो-दो साल से अधिक का समय बीत चुका है। लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण कंपनियों की परिसंपत्तियों की वैल्यू लगातार गिर रही है और बैंकों की रिकवरी कमजोर होती जा रही है।
सबसे ज्यादा दबाव मैन्युफैक्चरिंग, रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर में दिखाई दे रहा है। कुल मामलों में 36% हिस्सेदारी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की है, जबकि रियल एस्टेट 22% और कंस्ट्रक्शन 12% हिस्सेदारी के साथ पीछे हैं। अधूरे प्रोजेक्ट, कानूनी विवाद और फंडिंग संकट ने इन सेक्टर्स को दिवालिया प्रक्रिया का सबसे बड़ा चेहरा बना दिया है।
लिक्विडेशन मामलों की हालत भी कम चिंताजनक नहीं है। मार्च 2026 तक करीब 69% परिसमापन मामले दो साल से ज्यादा समय से लंबित पड़े हैं। यानी जिन कंपनियों को बंद किया जा चुका है, उनकी संपत्तियां बेचने और बैंकों को भुगतान करने की प्रक्रिया भी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही।
रिपोर्ट में 4.38 लाख करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन का खुलासा भी हुआ है। रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल्स ने 1,878 मामलों की जांच शुरू की है, जिनमें फर्जी ट्रांजैक्शन और संदिग्ध कॉम्बिनेशन डील्स शामिल हैं। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि कई कंपनियों में दिवालिया प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही संपत्तियां और पूंजी व्यवस्थित तरीके से बाहर निकाली गई।
सरकार ने IBC संशोधन अधिनियम 2026 के जरिए नए कानूनी बदलावों का रास्ता जरूर खोला है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि क्या ये बदलाव अदालतों और ट्रिब्यूनलों में अटके मामलों का पहाड़ कम कर पाएंगे, या फिर IBC बैंकों के लिए लगातार बढ़ते घाटे का दूसरा नाम बनता जाएगा।
