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जाबांज पॉलिटिकल-बिल्डर नेक्सस से गंजी हो चुकी खाड़ी और दादू हाल्या पाटिल का ‘लापता’ पता!

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कंक्रीट के उस आलीशान और बेरहम जंगल के नाम… जहां प्रकृति की बलि देकर ‘विकास’ की बहुमंजिला इमारतें खड़ी की जा चुकी हैं। इस गहरी पीड़ा, कड़वी हकीकत और पर्यावरण के विनाश को समेटते हुए, पेश है एक धारदार और तीखा व्यंग्य…
कंक्रीट के जंगल में खो गया दादू हाल्या पाटिल का कूचा: दिवा-डोंबिवली मैंग्रोव्स विनाश की कड़वी हकीकत

अगर आप मुंबई या ठाणे की लोकल ट्रेनों में धक्के खाने के आदी हैं, तो आपने भी ‘विकास’ को अपनी आंखों से रेंगते और फिर अचानक छलांग मारते देखा होगा। ज्यादा पुरानी बात नहीं है, महज़ 15 से 20 साल पहले की बात है। जब मध्य रेलवे की लोकल ट्रेन ठाणे स्टेशन छोड़कर आगे बढ़ती थी, तो दिवा स्टेशन से कुछ मीटर पहले ही हवा में एक सोंधी सी महक और आंखों को सुकून देने वाली हरियाली तैरने लगती थी।

वहां खाड़ी के किनारे, घने मैंग्रोव्स के बीच एक पुराना सा मकान हुआ करता था। उस मकान की दीवार पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था- ‘दादू हाल्या पाटिल’।

लोकल के डिब्बे में पसीने से लथपथ, एक-दूसरे की कोहनी बर्दाश्त करते मुसाफिरों के लिए वह नाम किसी जीपीएस से कम नहीं था। उस नाम को देखते ही मन में तसल्ली की एक ठंडी लहर दौड़ जाती थी कि चलो भाई, अब डोंबिवली स्टेशन आने ही वाला है।

दादू हाल्या पाटिल कौन थे, क्या करते थे, इतिहास के किस पन्ने में दर्ज थे, यह अलबत्ता मैं नहीं जानता। लेकिन दादू हाल्या पाटिल का मकान लाखों रेल मुसाफिरों के लिए ‘लैंडमार्क’ था, एक जीता-जागता भरोसा था।

मगर अफ़सोस! इन पिछले पंद्रह सालों में हमारे देश ने ‘तरक्की’ की ऐसी घुट्टी पी है कि अब दादू हाल्या पाटिल का वह नाम कंक्रीट के मलबे के नीचे दम तोड़ चुका है।

हमारे देश के जांबाज ‘पॉलिटिकल-बिल्डर नेक्सस’ (नेता-बिल्डर गठजोड़) को हरी-भरी खाड़ियां और लहलहाते मैंग्रोव्स देखकर न जाने क्यों कब्ज होने लगती है। उन्होंने ऐसी जादू की छड़ी घुमाई कि जो मैंग्रोव्स कभी समंदर की लहरों को रोकते थे, उन्हें इस तरह साफ़ कर दिया गया, जैसे किसी भुक्तभोगी के सिर से बाल सफाचट हो जाते हैं! बिल्कुल क्लीन शेव!

पर्यावरणविद चिल्लाते रहे, कानून की किताबें धूल फांकती रहीं, लेकिन बिल्डर जी के कंक्रीट मिक्सर ने चौबीसों घंटे वो सुर छेड़ा कि देखते ही देखते हरी-भरी खाड़ी ‘प्रोग्रेसिव डंपिंग ग्राउंड’ बन गई और उस पर खड़ी हो गईं 10-20 मंजिला वो इमारतें, जिनमें रहने वालों को खुद नहीं पता कि अगली बारिश में उनकी सोसाइटी में नाव चलेगी या स्टीमर।

आज अगर आप उसी लोकल ट्रेन से गुजरेंगे, तो आपको दादू हाल्या पाटिल का घर ढूंढने के लिए दूरबीन लगानी पड़ेगी। वह पुराना मकान अब चारों तरफ़ से खड़ी अट्टालिकाओं, अवैध और अर्ध-वैध कंक्रीट के खंभों के बीच इस तरह दबककर बैठ गया है, जैसे किसी शरीफ़ आदमी को चार गुंडों ने घेर रखा हो।

अब न तो वह सुकून देने वाली खाड़ी बची है, न वे मैंग्रोव्स बचे हैं जो कभी प्रकृति का फेफड़ा हुआ करते थे। अब वहां सिर्फ़ और सिर्फ़ ‘फ्लोर स्पेस इंडेक्स’ (FSI), काले धन को सफेद करने की मशीनें और ‘खाड़ी फेसिंग’ फ्लैट्स बेचने वाले दलालों के होर्डिंग्स बचे हैं।

वाह री तरक्की! कमाल की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था है हमारी! आम आदमी अगर अपने घर की खिड़की भी थोड़ी बाहर निकाल ले, तो महानगर पालिका का बुलडोजर पूरे दलबल के साथ पहुंच जाता है। लेकिन जब पूरी की पूरी खाड़ी निगल ली जाती है, मैंग्रोव्स का कत्लेआम कर दिया जाता है, तब सरकारी बाबू और रसूखदार नेता ‘धृतराष्ट्र’ बनकर अपनी तिजोरियों का साइज नाप रहे होते हैं।

मुबारक हो साहब! हमने दादू हाल्या पाटिल की पहचान मिटा दी, हमने खाड़ी को सुखा दिया, हमने मैंग्रोव्स को दफना दिया। अब हमारे पास कंक्रीट का वो आलीशान जंगल है, जहां हवा नहीं, सिर्फ़ प्रदूषण बिकता है। अगली बार जब दिवा होते हुए डोंबिवली स्टेशन आए और आपकी जेब न कटे, तो समझ जाना कि आप उसी ‘महान विकास’ के हिस्से से गुजर रहे हैं, जहां दादू हाल्या पाटिल का नाम अब सिर्फ़ यादों के मलबे में दबा पड़ा है!


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