भारतीय कंपनियों को हर साल करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा
आधी कॉर्पोरेट आबादी तनाव में, कंपनियां वेलनेस पर लगा रहीं करोड़ों
✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | भारत की कॉर्पोरेट दुनिया में ‘ऑफिस खत्म होने के बाद भी काम’ की संस्कृति अब कर्मचारियों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर भारी पड़ने लगी है। फिटनेस और वेलनेस प्लेटफॉर्म की नई रिपोर्ट ‘द ऑलवेज ऑन एपिडेमिक’ के मुताबिक देश का लगभग हर दूसरा कॉर्पोरेट कर्मचारी उच्च तनाव की स्थिति में जी रहा है, जबकि केवल 19 फीसदी कर्मचारियों को ही लगता है कि उनके जीवन और काम के बीच संतुलन बना हुआ है।
रिपोर्ट बताती है कि लंबे कामकाजी घंटे, लगातार ऑनलाइन उपलब्ध रहने का दबाव और निजी समय की कमी कर्मचारियों को मानसिक थकावट की ओर धकेल रहे हैं। करीब 30 फीसदी प्रोफेशनल्स तनाव से निपटने के लिए अनहेल्दी तरीकों जैसे अत्यधिक स्क्रीन टाइम और तनाव में ज्यादा खाना खाने का सहारा ले रहे हैं। वहीं 40 फीसदी कर्मचारियों ने माना कि वे तनाव कम करने के लिए फिटनेस गतिविधियों का उपयोग करते हैं।
हालांकि कॉर्पोरेट सेक्टर में बढ़ते तनाव के बीच कंपनियां अब कर्मचारियों की सेहत पर भारी निवेश कर रही हैं। ‘इंडियन एंटरप्राइज वेलनेस लैंडस्केप रिपोर्ट’ के अनुसार बेंगलुरु, मुंबई, हैदराबाद, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता जैसे छह बड़े महानगरों में कॉर्पोरेट वेलनेस बाजार 2027 तक 4,000 करोड़ रुपये के पार पहुंच सकता है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यह क्षेत्र 5.6 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा निवेश ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) और बैंकिंग-फाइनेंस सेक्टर की कंपनियां कर रही हैं। कॉर्पोरेट परिसरों में योग कार्यक्रमों की मांग तेजी से बढ़ी है, जहां इसकी भागीदारी दर 73 से 90 फीसदी तक पहुंच गई है। कैंपस जिम और कर्मचारियों के लिए जिम सदस्यता भी सबसे लोकप्रिय सुविधाओं में शामिल हैं।
आईटी और जीसीसी कंपनियों की अधिक मौजूदगी के कारण अकेला बेंगलुरु देश के कुल कॉर्पोरेट वेलनेस बाजार का 23 फीसदी हिस्सा रखता है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वेलनेस पर किया गया निवेश कंपनियों को 300 से 600 फीसदी तक रिटर्न दे सकता है, क्योंकि इससे उत्पादकता बढ़ती है, कर्मचारियों की अनुपस्थिति घटती है और प्रतिभाशाली कर्मचारियों को रोकने में मदद मिलती है।
हालांकि चमकदार वेलनेस अभियानों के पीछे कर्मचारियों की वास्तविक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 56 फीसदी कर्मचारी “मंडे टू 5” श्रेणी में हैं, यानी वे काम पर तो मौजूद रहते हैं लेकिन मानसिक रूप से पूरी तरह जुड़ाव महसूस नहीं करते। वहीं 24 फीसदी कर्मचारी रोजाना 12 घंटे से अधिक काम कर रहे हैं और बर्नआउट की स्थिति में पहुंच चुके हैं।
महिलाओं में तनाव की स्थिति और ज्यादा गंभीर पाई गई। 72 फीसदी महिला कर्मचारियों ने उच्च तनाव स्तर की शिकायत की, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 54 फीसदी रहा। रिपोर्ट के अनुसार करीब 60 फीसदी कर्मचारियों के पास दिन में खुद के लिए सिर्फ दो से चार घंटे का समय बचता है।
काम के दबाव का असर अब नौकरी छोड़ने की प्रवृत्ति में भी दिखाई दे रहा है। लगभग 49 फीसदी कर्मचारी नई नौकरी की तलाश में हैं, जबकि 34 फीसदी कर्मचारियों ने माना कि वे रोजाना गुस्से और चिड़चिड़ाहट का अनुभव करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक खराब मानसिक स्वास्थ्य के कारण उत्पादकता में गिरावट, अनुपस्थिति, कर्मचारियों के पलायन और इलाज पर बढ़ते खर्च से भारतीय कंपनियों को हर साल करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है।
