✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई / नई दिल्ली | दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच विदेशी मुद्रा भंडार की दौड़ में एशियाई देशों का दबदबा लगातार मजबूत होता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, चीन 3.41 ट्रिलियन डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ दुनिया में पहले स्थान पर बना हुआ है, जबकि जापान 1.26 ट्रिलियन डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर है। भारत 543 अरब डॉलर के भंडार के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार रखने वाला देश बनकर उभरा है।
सूची में तीसरे स्थान पर स्विट्जरलैंड है, जिसके पास 932.3 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। इसके बाद ताइवान 602.5 अरब डॉलर के साथ चौथे स्थान पर है। भारत के बाद सऊदी अरब, हांगकांग, रूस, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर का स्थान है। दुनिया के 10 सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में सात एशियाई देशों का शामिल होना वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते केंद्र की ओर संकेत करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 1997 के एशियाई वित्तीय संकट के बाद क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं ने विदेशी पूंजी पर निर्भरता के जोखिम को देखते हुए बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा भंडार जुटाने की रणनीति अपनाई थी। निर्यात आधारित विकास मॉडल, लगातार व्यापार अधिशेष और मुद्रा स्थिरता बनाए रखने की नीति ने एशियाई देशों के भंडार को तेजी से बढ़ाया।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद अमेरिका 244.6 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार के साथ 13वें स्थान पर है। इसकी प्रमुख वजह अमेरिकी डॉलर का वैश्विक आरक्षित मुद्रा के रूप में इस्तेमाल होना है, जिसके कारण अमेरिका को अन्य देशों की तरह बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्राएं जमा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
आईएमएफ के आंकड़ों के अनुसार, विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग केंद्रीय बैंक मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप, आयात भुगतान, विदेशी ऋण दायित्वों को पूरा करने और वैश्विक आर्थिक झटकों के दौरान वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए करते हैं।
