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50 साल के शिखर पर पहुंचा केंद्रीय बैंकों का सोना भंडार, डॉलर पर निर्भरता घटाने की रणनीति तेज

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डॉलर से मोहभंग! वैश्विक पाबंदियों के डर से केंद्रीय बैंकों ने लगाया सोने का अंबार

✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई / नई दिल्ली | वैश्विक राजनीति में बढ़ते तनाव और आर्थिक अनिश्चितता के बीच, दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों में अब अमेरिकी डॉलर और विदेशी बांड्स पर निर्भरता कम करके ‘भौतिक सोने’ (Physical Bullion) का सुरक्षित भंडार खड़ा करने की एक आक्रामक होड़ छिड़ गई है। केंद्रीय बैंक एक मजबूत और सुरक्षित आर्थिक कवच तैयार करने में जुट गए हैं।

भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक अस्थिरता के इस दौर में दुनिया भर के केंद्रीय बैंक रिकॉर्ड स्तर पर सोना खरीद रहे हैं। वैश्विक केंद्रीय बैंकों का कुल स्वर्ण भंडार 36,000 टन को पार कर गया है, जो 1975 के बाद यानी पिछले 50 सालों का सबसे उच्चतम स्तर है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, पिछले चार वर्षों से बैंक हर साल औसतन 1,000 टन सोना खरीद रहे हैं, जो पिछले दशक की तुलना में दोगुना है। यही अंधाधुंध खरीदारी अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में आए हालिया रिकॉर्ड उछाल का सबसे बड़ा इंजन बनी है।

इस वित्तीय बदलाव की टाइमलाइन को देखें तो यह उछाल सीधे तौर पर 2022 में रूस पर लगे पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों से जुड़ा है। यूक्रेन युद्ध के बाद जब अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस को वैश्विक भुगतान प्रणाली ‘स्विफ्ट’ (SWIFT) से बाहर किया और उसके 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज कर दिया, तब उभरती अर्थव्यवस्थाओं को समझ आ गया कि संकट के समय डॉलर आधारित संपत्तियां सुरक्षित नहीं हैं। नतीजतन, चीन, भारत, तुर्की और रूस जैसे देशों ने वित्तीय प्रतिबंधों के खिलाफ सोने को एक अभेद्य सुरक्षा ढाल बना लिया है, क्योंकि इसे कोई भी बाहरी ताकत न तो डिजिटल रूप से फ्रीज कर सकती है और ना ही जब्त।

स्थिति यह है कि अब केंद्रीय बैंकों के पोर्टफोलियो में पारंपरिक रूप से सबसे सुरक्षित माने जाने वाले ‘अमेरिकी ट्रेजरी बांड’ (22%) की हिस्सेदारी घट गई है और सोने की हिस्सेदारी बढ़कर 27% हो चुकी है। वैश्विक महंगाई और मंदी के खतरों के बीच सोना आज भी लंबी अवधि के लिए सबसे भरोसेमंद एसेट साबित हो रहा है।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के ताजा सर्वे में शामिल 45% केंद्रीय बैंकों ने माना है कि वे अगले एक साल में अपने सोने के भंडार को और बढ़ाएंगे। यह ट्रेंड साफ इशारा करता है कि भले ही दुनिया फिर से पूरी तरह ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ पर न लौटे, लेकिन अमेरिकी डॉलर की एकतरफा बादशाहत को चुनौती देने के लिए सोने की यह चमक आने वाले दिनों में और तेज होने वाली है।

 


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