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डिजिटल इंडिया के शोर में ‘कैशलेस’ दावों की निकली हवा: नोटबंदी के बाद दोगुना हुआ नकदी का पहाड़, चलन में 176 अरब नोट

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✍️ प्रहरी विशेष संवाददाता, नई दिल्ली | काले धन के खात्मे और ‘कैशलेस इकोनॉमी’ के नाम पर देश को कतारों में खड़ा करने वाली भाजपा सरकार के तमाम दावों की पोल अब खुद भारतीय रिज़र्व बैंक के ताजा आंकड़ों ने खोल दी है। डिजिटल पेमेंट्स और यूपीआई के नाम पर पीठ थपथपाने वाले हुक्मरानों के दौर में देश की अर्थव्यवस्था में नकदी का अंबार घटने के बजाय रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है।

भारतीय रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू ने जकार्ता में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में इस जमीनी हकीकत पर मुहर लगाते हुए स्पष्ट किया है कि भारत में डिजिटल लेन-देन के भारी उछाल के बावजूद करेंसी इन सर्कुलेशन में दहाई अंकों की दर से लगातार बढ़ोतरी हो रही है। देश के ग्रामीण अंचलों, कस्बों, छोटे कारोबारियों और आम जनता के बीच आज भी नकदी का ही दबदबा कायम है, जिससे यह साफ हो गया है कि सत्ता के बड़े-बड़े विज्ञापनों और दावों के उलट भारत अब भी कागजी नोटों के भरोसे ही सांस ले रहा है।

सरकारी दावों और आंकड़ों के इस विरोधाभास की परतें तब और खुल जाती हैं जब नोटबंदी के दौर से इसकी तुलना की जाती है। नवंबर 2016 में जब तुगलकी फरमान सुनाकर 86 फीसदी करेंसी को एक झटके में रद्दी कर दिया गया था, तब देश में कुल 17.74 लाख करोड़ से 17.97 लाख करोड़ रुपये की नकदी चलन में थी। उस वक्त जनता से वादा किया गया था कि यह दर्द केवल कुछ दिनों का है और इसके बाद देश पूरी तरह डिजिटल व कैशलेस होकर भ्रष्टाचार मुक्त हो जाएगा। लेकिन एक दशक बीतते-बीतते यह तस्वीर पूरी तरह उलट गई और नकदी का यह पहाड़ सिकुड़ने के बजाय दोगुने से भी अधिक बढ़कर अब 36 लाख करोड़ से 38 लाख करोड़ रुपये के पार निकल चुका है।

इतना ही नहीं, नोटबंदी से ठीक पहले जहां देश में कुल 90 से 95 अरब बैंक नोटों के टुकड़े घूम रहे थे, वहीं आज यह संख्या लगभग 85 से 95 फीसदी की छलांग लगाकर 176 अरब (17,600 करोड़) नोटों के विशालकाय आंकड़े पर पहुंच चुकी है। भारत में नोटों का यह अंबार अमेरिका के 56 अरब डॉलर बिल और पूरे यूरो जोन के 30 अरब यूरो नोटों के मुकाबले कई गुना बड़ा है।

नकदी की छपाई और पुराने नोटों को नष्ट करने के इस चक्रव्यूह ने सरकारी लॉजिस्टिक्स तंत्र की कमर तोड़ दी है। हर साल 28 से 30 अरब नए नोट छापने और 21 अरब सड़े-गले नोटों को नष्ट करने का भारी-भरकम वित्तीय बोझ जनता के टैक्स के पैसे पर पड़ रहा है, जिससे निपटने के लिए अब केंद्रीय बैंक नोटों पर कोटिंग और पॉलीमर के विकल्प तलाशने में जुटा है।

दूसरी तरफ, शून्य एमडीआर और डिजिटल क्रांति के नाम पर निजी फिनटेक कंपनियों ने साउंडबॉक्स रेंटल, स्वाइप मशीनों और कर्ज बांटने के कमीशन से 4.6 अरब डॉलर का भारी-भरकम बाजार खड़ा कर लिया है। साफ है कि भाजपा का ‘कैशलेस भारत’ का बहुप्रचारित नारा केवल चुनावी जुमला और कॉरपोरेट इवेंट मैनेजमेंट साबित हुआ, जबकि आर्थिक मोर्चे पर सरकार की नीतियों की नाकामी के चलते आज भी आम जनता और बाजार की रगों में नकदी का ही राज चल रहा है।


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