भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम में परिवारवाद को ‘सदाचार’ और दलबदलुओं को मिला इनाम
✍️ प्रहरी विशेष संवाददाता, नई दिल्ली | भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा घोषित केंद्रीय पदाधिकारियों की 51 सदस्यीय नई जंबो टीम ने पार्टी के तमाम नारों, दावों और रणनीतिक संतुलन की जमीनी हकीकत को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। खुद को ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ और परिवारवाद की सबसे कट्टर विरोधी बताने वाली भाजपा की इस नई फेहरिस्त में राजनीतिक विरासत वाले दिग्गजों को सिर-आंखों पर बिठाया गया है, जबकि दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को निष्ठावान काडर के सिर पर बैठाकर मलाईदार पदों से नवाजा गया है।
सोशल इंजीनियरिंग के दावों की हवा निकली
संगठन की इस नई जमात में सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग के दावों की हवा उस वक्त निकलती दिखती है जब शीर्ष और महत्वपूर्ण पदों पर नजर डाली जाए। टीम में अगड़ी जातियों का दबदबा करीब 55 से 58 फीसदी सीटों पर बरकरार है, जहां संगठन की रीढ़ कहे जाने वाले संगठन महासचिव, संयुक्त संगठन महासचिव, केंद्रीय कोषाध्यक्ष, सह-कोषाध्यक्ष, मीडिया विभाग और मुख्य महासचिवियों में ब्राह्मण और वैश्य चेहरों की ही तूती बोल रही है। अकेले ब्राह्मण समाज को 12 से ज्यादा महत्वपूर्ण पदों के साथ करीब 24 फीसदी हिस्सेदारी सौंपी गई है, वहीं वैश्य और मारवाड़ी वर्ग पार्टी की तिजोरी और रणनीतिक चक्रव्यूह पर पूरी तरह काबिज है।
ओबीसी को मोर्चे की कप्तानी से खुश करने की कोशिश
दूसरी तरफ, देश में 50 फीसदी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को महज 27 फीसदी और 15 पदों पर ही समेट दिया गया है, जिनमें से अधिकतर को मोर्चों की कप्तानी या सामान्य सचिव बनाकर खुश करने की कोशिश की गई है। अनुसूचित जाति (एससी) को महज 4 पद यानी 7.84 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (एसटी) को 6 पद यानी 11.76 प्रतिशत देकर सांकेतिक प्रतिनिधित्व की रस्म अदायगी पूरी कर ली गई है।
महिला आरक्षण का कानून संगठन की दहलीज पार करने में हांफा
नारी सशक्तिकरण और महिला आरक्षण के लंबे-चौड़े भाषणों के बीच आधी आबादी को इस राष्ट्रीय टीम में महज 17.6 फीसदी (सिर्फ 9 महिलाएं) की ही ‘कृपा’ नसीब हुई है, जिससे साफ है कि 33 फीसदी आरक्षण का कानून संगठन की दहलीज पार करने में अब भी हांफ रहा है। चुनावी रणनीति के तहत उत्तर प्रदेश से 8, दिल्ली से 6 और मध्य प्रदेश से 5 नेताओं को लाकर हिंदी पट्टी का पलड़ा भारी रखा गया है, जबकि दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों को सिर्फ प्रतीकात्मक टोकन के तौर पर कुछ चेहरों तक सीमित कर दिया गया है।
भाजपा के ‘परिवारवाद विरोधी’ चेहरे की खुली पोल
सबसे दिलचस्प तंज भाजपा के उस बहुचर्चित ‘परिवारवाद विरोधी’ चेहरे पर कसा जा सकता है, जिसे मंचों से लगातार कोसा जाता है। विजयाराजे सिंधिया की विरासत वाली वसुंधरा राजे, एनटीआर की बेटी डी. पुरंदेश्वरी, कांग्रेस दिग्गज एके एंटनी के बेटे अनिल एंटनी और पूर्व सांसद आरके सिन्हा के पुत्र ऋतुराज सिन्हा जैसे चेहरों को राष्ट्रीय टीम में प्रमुख कुर्सियां देकर भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि परिवारवाद जब विपक्ष में हो तो ‘गुनाह’ है, और जब केसरिया चोला पहन ले तो वह ‘अनुभव का संगम’ बन जाता है।
दलबदलू नेताओं पर मेहरबानी
वहीं मनप्रीत बादल, बैजयंत पांडा और रोहन गुप्ता जैसे कांग्रेस-बीजेडी से आए दलबदलू नेताओं की सीधी राष्ट्रीय टीम में एंट्री ने दशकों से दरी बिछा रहे मूल काडर के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है। कुल मिलाकर, यह नई सूची ‘काडर की मेहनत और मलाई दिग्गजों की’ के पुराने ढर्रे पर सजी एक ऐसी बानगी है, जहां अगड़े रणनीतिकार हैं और बाकी वर्ग सिर्फ चुनावी गणित साधने के औजार।

