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छतों पर सजा ‘ग्रीन फ्यूचर’ या ज़मीन में दफ़न होता ज़हर: सोलर क्रांति के पीछे पनपता लाखों टन कचरे का अदृश्य संकट

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  • सूरज से बिजली बनाने की दौड़ में दुनिया भर में जमा हुआ 10 लाख टन ई-वेस्ट

  • भारत में 2030 तक 3.4 लाख टन पहुंचेगा आंकड़ा

  • लैब टेस्ट का अनसुलझा खेल और भारी-भरकम ख़र्च बना बड़ी मुसीबत

✍️ प्रहरी संवाददाता, मुंबई | सूरज की किरणों से साफ-सुथरी बिजली बनाने का दावा करने वाली दुनिया एक बड़े और अनदेखे ख़तरे की तरफ़ तेज़ी से बढ़ रही है। 25 साल तक बिजली पैदा करने के बाद जब सोलर पैनल बेकार होकर ‘रिटायर’ होते हैं, तो वे सिर्फ़ कबाड़ नहीं बनते, बल्कि पर्यावरण के लिए एक उलझी हुई पहेली बन जाते हैं।

इस वक़्त पूरी दुनिया में करीब दस लाख टन सोलर कचरा जमा हो चुका है और हर साल चार से पांच लाख टन बेकार पैनल इस ढेर में और जुड़ रहे हैं। भारत में भी यह आंकड़ा पचास हज़ार टन के आसपास पहुंच चुका है, जिसके साल 2030 तक तीन लाख टन से ऊपर और सदी के मध्य तक एक करोड़ टन के ख़तरनाक स्तर को पार कर जाने की पूरी आशंका है।

समस्या यह नहीं है कि ये पैनल कबाड़ बन रहे हैं, असली आफ़त यह है कि किसी को पक्के तौर पर नहीं पता कि इनमें से कौन सा पैनल सामान्य कचरा है और कौन सा ज़हरीला तेजाब।

कानून की नज़र में किसी बेकार सोलर पैनल का भविष्य तय करने के लिए बेहद अजीबोगरीब रास्ता अपनाया जाता है। लैब में पैनल को नाखून से भी छोटे टुकड़ों में काटकर हल्के एसिड से भरी बोतल में 18 घंटे तक उल्टा-पुल्टा घुमाया जाता है। इसके बाद देखा जाता है कि एसिड में कितना लेड यानी सीसा घुला। अगर यह मात्रा 5 पार्ट्स प्रति मिलियन  (PPM) से ज़रा भी ज़्यादा निकल आई, तो पैनल को सरकारी ठप्पे के साथ ‘खतरनाक कचरा’ घोषित कर दिया जाता है।

हैरानी की बात यह है कि एक ही मैन्युफैक्चरिंग लाइन से, एक ही दिन बनकर निकले दो एक जैसे पैनलों में से एक इस टेस्ट में पास होकर सामान्य कचरा बन जाता है और दूसरा ज़हरीले कचरे की लिस्ट में डंप हो जाता है। यह अनिश्चितता इसलिए है क्योंकि टेस्ट यह नहीं देखता कि पैनल में क्या-क्या लगा है, बल्कि यह नापता है कि एसिड में घुलकर कितना केमिकल बाहर आया।

इस अनिश्चितता के बीच असली खेल पैसे और अफ़सरशाही का है। किसी एक पैनल का यह लेचिंग टेस्ट कराने में अमेरिका और यूरोप में साठ हज़ार से लेकर डेढ़ लाख रुपये ($750 से $1,800) तक का ख़र्च आता है, जबकि भारत में भी लैब की फ़ीस हज़ारों में बैठती है। नतीजा यह होता है कि ठेकेदार और ठेके पर काम करने वाली एजेंसयां इस भारी-भरकम ख़र्च और लालफ़ीताशाही से बचने के लिए बिना किसी जांच-परख के पूरे के पूरे लॉट को छुपाकर ज़मीन के गड्ढों में दबा देती हैं या अवैध कबाड़ियों के हवाले कर देती हैं।

छतों पर लगे 95 फ़ीसदी सिलिकॉन पैनलों में कैडमियम नहीं, बल्कि सिर्फ़ सोल्डर रिबन में मामूली लेड (सीसा) होता है। यद्यपि भारत ने ‘ई-वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स’ में सोलर कचरे को शामिल कर लिया है, लेकिन देश में सस्ते रीसाइक्लिंग तंत्र और कड़े ज़मीनी नियमों के अभाव में आज हर पुराना पैनल एक ऐसा कानूनी और पर्यावरणीय बम बना हुआ है, जिसकी ज़िम्मेदारी उठाने से हर कोई बच रहा है।

 


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