✍️ विशेष रिपोर्ट, मुंबई | देश की राजनीति में राष्ट्रवाद का केंद्र बिंदु बदलने और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को अपने अनुकूल पुनर्गठित करने की रणनीति के तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पिछले एक दशक में एक व्यापक राजनीतिक और वैचारिक रोडमैप लागू किया है। यह एजेंडा केवल सत्ता संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के ऐतिहासिक आख्यानों के पुनर्गठन और आजादी की विरासत पर राजनीतिक नियंत्रण हासिल करने की सुनियोजित कोशिश है।
स्वतंत्रता संग्राम में संघ की भूमिका को लेकर बहस पुरानी है। संघ समर्थक जहां संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के 1921 व 1930 के सत्याग्रहों, जंगल सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भूमिगत क्रांतिकारियों को दिए गए आश्रय का हवाला देते हैं; वहीं विरोधी दल आरोप लगाते हैं कि एक संगठन के रूप में आरएसएस मुख्यधारा के आंदोलनों से संस्थागत रूप से दूर रहा। इसी ऐतिहासिक धारणा को बदलने और अपनी केंद्रीय भूमिका स्थापित करने के लिए संघ परिवार आक्रामक राष्ट्रवाद का सहारा ले रहा है।
इस वैचारिक बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक कांग्रेस के दिग्गजों और स्वतंत्रता सेनानियों का राजनीतिक व सांस्कृतिक अधिग्रहण है। संघ-भाजपा ने सरदार वल्लभभाई पटेल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, बाबू जगजीवन राम और लाल बहादुर शास्त्री जैसे राष्ट्रीय नायकों को अपनी वैचारिक पंक्ति में अग्रिम स्थान दिया है। इसके साथ ही, पिछले एक दशक में पूर्व मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों सहित 150 से अधिक प्रमुख कांग्रेसी नेताओं को पार्टी में शामिल कराया गया है। इस रणनीति से कांग्रेस के उस ऐतिहासिक एकाधिकार को सीधा आघात पहुंचा है, जिसे वह दशकों से अपना राजनीतिक आधार मानती आई थी।
‘तिरंगा यात्रा’ और ‘हर घर तिरंगा’ जैसे अभियानों के माध्यम से संघ परिवार राष्ट्रवाद के प्रतीक चिन्हों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर रहा है। संघ मुख्यालय पर राष्ट्रीय ध्वज न फहराने के विपक्ष के पुराने आरोपों को ध्वस्त करते हुए इन यात्राओं के जरिए संदेश दिया जा रहा है कि राष्ट्रध्वज किसी एक दल की बपौती नहीं है। इस लामबंदी के जरिए संघ ‘राष्ट्र-प्रथम’ के नारे के तहत अपने सामाजिक आधार को और गहरा कर रहा है।
सरकारी एंथम और तिरंगा अभियानों के विशाल बजट पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी अनुमानों के अनुसार, केंद्र व राज्य सरकारों के प्रचार बजट, सीएसआर फंड और पार्टी मशीनरी के सम्मिलित खर्चों को जोड़ें तो इन अभियानों पर अब तक लगभग 1,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खर्च हो चुकी है। हालांकि, सत्तारूढ़ दल इसे जन-जन में नागरिक कर्तव्य और देशभक्ति जगाने का निवेश बताता है।
इस पूरी कवायद से संघ और भाजपा को दोहरा राजनीतिक लाभ मिला है। पहला, भाजपा ने राष्ट्रवाद को चुनाव का सबसे प्रभावी और अभेद्य हथियार बनाकर विपक्षी मुद्दों को गौण कर दिया है। दूसरा, आरएसएस खुद को ऐतिहासिक हाशिए से बाहर निकालकर राष्ट्रीय निर्माण की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करने में सफल रहा है। ऐतिहासिक नायकों को अपनाने और तिरंगे को अपने विमर्श का केंद्र बनाने की इस नीति ने भाजपा को चुनावी राजनीति में अजेय बढ़त प्रदान की है।

