✍️ विशेष आर्थिक डेस्क, नई दिल्ली | केंद्र सरकार का विदेशी कर्ज 2014-15 से 2025-26 के बीच करीब 84 फीसदी बढ़ा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 के अंत में केंद्र सरकार का बाहरी कर्ज करीब 3.66 लाख करोड़ रुपए था। 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह बढ़कर 6.74 लाख करोड़ रुपए हो गया। यानी 12 वर्षों में विदेशी कर्ज करीब 3.08 लाख करोड़ रुपए बढ़ा है।
आंकड़े कहते हैं कि विदेशी कर्ज की वृद्धि केंद्र सरकार की कुल देनदारियों की तुलना में काफी कम है। 2025-26 में केंद्र की कुल देनदारियां 197.18 लाख करोड़ रुपए हो गई हैं, जबकि बाहरी कर्ज 6.74 लाख करोड़ रुपए है। यानी सरकारी कुल देनदारियों में इसका हिस्सा लगभग 3.4 फीसदी बैठता है। सार्वजनिक कर्ज में भी बाहरी कर्ज का हिस्सा अपेक्षाकृत छोटा है।
विदेशी कर्ज के आंकड़े को समझते समय रुपये और विदेशी मुद्राओं की विनिमय दर बेहद महत्वपूर्ण है। बजट के स्टेटमेंट ऑफ लायबिलिटी में बाहरी कर्ज का आंकड़ा बुक वैल्यू यानी ऐतिहासिक विनिमय दर पर दर्ज किया जाता है। इसी कारण मौजूदा बाजार विनिमय दर पर विदेशी कर्ज का रुपये में मूल्य इससे अधिक दिखाई दे सकता है।
रुपया कमजोर होने पर डॉलर या दूसरी विदेशी मुद्रा में बकाया कर्ज की मूल राशि विदेशी मुद्रा में नहीं बदलती, लेकिन उसे रुपये में चुकाने की लागत बढ़ जाती है। डॉलर में कर्ज की राशि समान रहने के बावजूद यदि डॉलर 80 रुपए से बढ़कर 90 रुपए हो जाए तो उसी डॉलर कर्ज को चुकाने के लिए अधिक रुपये जुटाने पड़ेंगे। यही असर विदेशी कर्ज के ब्याज भुगतान पर भी पड़ता है। शुक्रवार को रुपया डॉलर के मुकाबले लुढ़क कर 96 के स्तर को पार कर गया था। अनुमान है कि अक्टूबर तक 1 डॉलर की वैल्यू 97 रुपया हो जाएगा।
हालांकि केंद्र सरकार की कुल उधारी का अधिकांश हिस्सा रुपये में घरेलू कर्ज है। इसलिए रुपये की गिरावट का सीधा विदेशी मुद्रा जोखिम मुख्यतः बाहरी कर्ज पर पड़ता है, जबकि घरेलू कर्ज पर इसका असर महंगाई, ब्याज दर, सरकारी बॉन्ड की यील्ड और बाजार में पूंजी की लागत के रास्ते आता है। 2025-26 के सरकारी आंकड़ों में बाहरी कर्ज 6.74 लाख करोड़ रुपए है, जबकि आंतरिक कर्ज अकेले 172.69 लाख करोड़ रुपए है।
