ताज़ा खबर
OtherPoliticsTop 10ताज़ा खबरसंपादकीय

संपादकीय: बंगाल का नया कैनवास और हठधर्मिता का ढहता महल

Share

इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह स्वयं को दोहराता है, और राजनीति की त्रासदी यह है कि नेता उससे कभी सबक नहीं लेते।

पश्चिम बंगाल के हालिया राजनीतिक परिदृश्य ने एक बार फिर उस कड़वे सच को तस्दीक दी है, जिसे भारतीय राजनीति के ‘क्षेत्रीय क्षत्रप’ अक्सर अपनी महत्वाकांक्षा के शोर में सुन नहीं पाते।

आज ममता बनर्जी जिस चौराहे पर खड़ी हैं, वह केवल एक चुनावी शिकस्त का मंजर नहीं है, बल्कि उस राजनैतिक भस्मासुर की कहानी है जिसे उन्होंने खुद हवा दी थी।

अस्तित्व का संकट और ‘परजीवी’ राजनीति
भारतीय चुनावी इतिहास गवाह है कि भाजपा के साथ गठबंधन करने वाले क्षेत्रीय दलों का हश्र अक्सर ‘अस्तित्व विलोपन’ जैसा रहा है। चाहे पंजाब में अकाली दल की साख हो, महाराष्ट्र में शिवसेना का विखंडन हो, बिहार में जनता दल यूनाइटेड हो, या ओडिशा में बीजद का ढहता किला, क्षेत्रीय दलों ने जब-जब राष्ट्रीय दलों के लिए अपनी जमीन साझा की, उनकी अपनी सियासी जमीन खिसकती गई।

ममता बनर्जी ने भाजपा को बंगाल की दहलीज पार कराने का जो रास्ता कभी चुनावी रणनीतियों के तहत खोला था, आज उसी पगडंडी को भाजपा ने ‘नेशनल हाईवे’ बनाकर तृणमूल के सत्ता-महल को ध्वस्त कर दिया है।

हठधर्मिता बनाम एकजुटता
ममता की हार केवल वोट बैंक का खिसकना नहीं है, बल्कि उनकी उस राजनैतिक हठधर्मिता की परिणति है, जिसने विपक्ष को कभी एक ठोस इकाई नहीं बनने दिया।

राष्ट्रीय स्तर पर ‘दीदी’ की छवि एक अजेय योद्धा की तो रही, लेकिन उनकी ‘एकला चलो’ की जिद ने अंततः उसी विपक्ष को कमजोर किया जिसे भाजपा के रथ को रोकना था। आज वे वही काट रही हैं जो उन्होंने अपनी रणनीतिक चूक से बोया था।

नई सत्ता: अग्निपरीक्षा की दहलीज पर
सत्ता परिवर्तन के बाद अब गेंद भाजपा के पाले में है। बंगाल जैसा जटिल राज्य, जहाँ की मिट्टी में बौद्धिक चेतना और सामाजिक संवेदनशीलता की गहरी जड़ें हैं, उसे चलाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।

अब परीक्षा केवल शासन की नहीं, बल्कि इन तीन बुनियादी स्तंभों की है:
1. सामाजिक सद्भाव: क्या नई सरकार उस ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ को अक्षुण्ण रख पाएगी जो सदियों से बंगाल की आत्मा रही है?

2. अल्पसंख्यक सुरक्षा: क्या राज्य के अल्पसंख्यकों के मन में ‘भय’ की जगह ‘भरोसे’ का बीज बोया जा सकेगा?

3. विकास का मॉडल: क्या बंगाल का विकास सांप्रदायिक धुव्रीकरण की भेंट चढ़ेगा या समावेशी प्रगति का नया अध्याय लिखेगा?

बंगाल का कैनवास बदल चुका है। रंगों की जगह अब नई लकीरें खींची जा रही हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि ‘सोनार बांग्ला’ का नारा लगाने वाली नई सत्ता बंगाल की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक ताने-बाने को कितना सहेज पाती है।

फिलहाल, ममता बनर्जी का ढहता किला उन तमाम क्षेत्रीय दलों के लिए एक चेतावनी है जो राष्ट्रीय राजनीति के साथ सौदेबाजी में अपनी जड़ें ही दांव पर लगा देते हैं।

भविष्य के गर्भ में छिपे सवाल आज बंगाल की हवाओं में तैर रहे हैं।


Share

Related posts

पांचवे चरण के चुनाव में घमासान, यूपी में कई दिग्गजों को बचानी होगी साख

samacharprahari

संविधान के 76 साल: गवई ने एकता का आधार बताया, फडणवीस ने चुनाव को सत्ता परिवर्तन का एकमात्र संवैधानिक माध्यम कहा

samacharprahari

गाजा की तरफ से हुए हमलों में दो लोगों की मौत

samacharprahari

भाजपा को पिछले साल 3,623 करोड़ रुपये का चंदा मिला

samacharprahari

पिछले 24 घंटे में 10 लाख से ज्यादा कोरोना की जांच

samacharprahari

मनी लांड्रिंग मामले में आईएएस पूजा सिंघल की जमानत याचिका खारिज

Vinay