ताज़ा खबर
OtherPoliticsTop 10ताज़ा खबरराज्यसंपादकीय

जल, जंगल, जमीन खाली करो, ‘प्रगति’ आएगी!

Share

विकास का रथ हांफता हुआ आता है, उसकी धमक से सदियों पुराने पत्ते थरथराते हैं। उसके पहियों के नीचे कुचले जाते हैं वे लोग जिनकी पहचान ही जल, जंगल और जमीन से है। एक अदृश्य युद्ध छिड़ा है, जिसके हथियार बुलडोजर हैं, नीतियां हैं और आंखों में चकाचौंध पैदा करने वाले ‘विकास’ के सपने हैं। और इस युद्ध के मोर्चे पर खड़े हैं आदिवासी और मूल निवासी, अपनी जड़ों को बचाने के लिए एक असहाय संघर्ष करते हुए।

उन्हें बताया जाता है कि यह सब उनके भले के लिए है। विशाल बांध बनेंगे, जिनसे खेतों में हरियाली आएगी और घरों में बिजली। खनिजों का दोहन होगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और रोजगार के अवसर पैदा होंगे। सड़कें और कारखाने बनेंगे, जो उन्हें ‘पिछड़ेपन’ के अंधेरे से निकालकर ‘आधुनिकता’ की रोशनी में लाएंगे। यह एक आकर्षक कहानी है, जिसे सत्ता के गलियारों में बड़ी चाव से सुनाया जाता है।

लेकिन, इस कहानी के स्याह पहलू को अक्सर छिपा लिया जाता है। यह नहीं बताया जाता कि बांध बनने से कितने गांव डूब जाएंगे और कितने लोग अपनी पुस्तैनी जमीन से बेदखल हो जाएंगे। यह नहीं बताया जाता कि खनिजों के खनन से जंगल कैसे उजड़ जाएंगे और नदियों का पानी कैसे जहरीला हो जाएगा। छोटे बड़े पहाड़ कैसे गायब हो जाएंगे। यह नहीं बताया जाता कि कारखानों की धुंध में उनके फेफड़े कैसे घुल जाएंगे और मशीनों की शोर में उनकी पारंपरिक कला और संस्कृति की आवाज कैसे दब जाएगी।

आदिवासी और मूल निवासी सदियों से इन जंगलों और पहाड़ों के अविभाज्य अंग रहे हैं। उनका जीवन प्रकृति के साथ घुला-मिला है। वे जल को पूजते हैं, जंगल को अपना घर मानते हैं और जमीन को अपनी मां। उनकी संस्कृति, उनके रीति-रिवाज, उनकी ज्ञान परंपराएं सब कुछ इसी त्रयी के इर्द-गिर्द घूमती हैं। जब उनसे यह सब छीन लिया जाता है, तो सिर्फ उनकी जमीन ही नहीं छिनती, बल्कि उनकी पहचान, उनका अस्तित्व और उनका भविष्य भी छिन जाता है।

उन्हें मुआवजा दिया जाता है, कुछ पैसे और पुनर्वास के वादे। लेकिन क्या पैसे उनकी उस जीवनशैली का मोल चुका सकते हैं जो प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित थी? क्या कंक्रीट के घरों में वे उस सुकून को पा सकते हैं जो उन्हें घने जंगलों की छांव में मिलता था? क्या नई बस्तियों में उनकी वह सामुदायिक भावना जीवित रह सकती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही थी?

यह ‘विकास’ अक्सर उनके लिए विनाश का पर्याय साबित होता है। वे अपनी जमीन खो देते हैं, अपनी आजीविका खो देते हैं और अंततः समाज के हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं। उनकी आवाज अनसुनी कर दी जाती है, उनके विरोध को दबा दिया जाता है और उन्हें ‘विकास विरोधी’ करार दे दिया जाता है।

सवाल यह है कि क्या विकास की कीमत हमेशा गरीबों और कमजोरों को ही चुकानी पड़ेगी? क्या ‘प्रगति’ का मतलब कुछ लोगों के लाभ के लिए अनगिनत लोगों का विस्थापन और उनकी संस्कृति का विनाश है? क्या हम एक ऐसा भविष्य नहीं बना सकते जहां विकास प्रकृति और मनुष्य के साथ सामंजस्य स्थापित करे, जहां हर किसी को अपनी जमीन, अपनी पहचान और अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का अधिकार हो?

यह एक अदृश्य युद्ध है, जिसमें गोलियों की आवाज नहीं आती, लेकिन चीखें जरूर सुनाई देती हैं। यह युद्ध तब तक जारी रहेगा जब तक हम ‘विकास’ के नाम पर हो रहे इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद नहीं करेंगे और यह नहीं समझेंगे कि जल, जंगल और जमीन सिर्फ संसाधन नहीं हैं, बल्कि अनगिनत जिंदगियों का आधार हैं।

 


Share

Related posts

रुपया नहीं गिर रहा, डॉलर हो रहा है मजबूत: सीतारमण

samacharprahari

रेलवे ने 5 महीने में 1.78 करोड़ टिकट किए रद्द, कमाई से ज्यादा पैसे लौटाए!

samacharprahari

भारत गौरव ट्रेन को प्राइवेट प्लेयर करेंगे ऑपरेट!

samacharprahari

अगले पांच वर्षों तक 80 करोड़ जनता को मिलेगा फ्री राशनः प्रधानमंत्री

samacharprahari

ठगी का कॉल सेंटर चला रहीं पांच महिलाएं अरेस्ट

Prem Chand

Loksabha Election: सरकारी वसूली, मंहगाई, खराब सड़कें और मुंबई की जर्जर हालत पर कांग्रेस का पोस्टर वॉर

Prem Chand