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आपन गांव व परधानी के चुनाव

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आपन गांव व परधानी के चुनाव

उत्तर प्रदेश के गांवों में प्रधान प्रत्याशियों की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। भले ही कोरोना महामारी के चलते यह चुनाव अगले साल अप्रैल के आख़िरी सप्ताह के बाद होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। लेकिन अभी से गांव में बैठकों का दौर शुरू है। जहाँ पहले सामाजिक कार्य करने वाले व ईमानदार लोग ही चुनाव मैदान में उतरते थे और उनमें गांव के विकास करने का जज्बा दिखता था। अब तो ऐसे लोग पैसे के बल पर प्रधान बनने का मन बनाये होंगे, जिनको गांव के विकास से कोई सरोकार नहीं। उन्हें तो मनरेगा की अकूत निधि दिखाई पड़ रही है। मनरेगा के धन को दोहन करने की यही लालसा अब प्रशासन के सबसे निचले पायदान पर चढ़ने व बढ़ने लगी है।

देखा भी गया है कि अधिकांश प्रधान ऐसे हैं, जो कि अपने 5 साल के कार्य काल के दौरान कभी भी विधायक या सांसद या जिला अधिकारी से मिलकर गांव के विकास की बात सही ढंग से कह पाए हों। सही तौर पर देखा जाए तो यदि ईमानदारी से मनरेगा निधि का सदुपयोग किया जाए तो गाँव स्वर्ग बन जाए।लेकिन मनरेगा भ्रष्टाचार की नदी बन चुकी है और हर कोई इसमें अपनी अंजुली भर लेना चाहता है।

उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों में मनरेगा के नाम पर खुलेआम लूट मची है। इसमें ब्लॉक के तमाम कर्मचारी से लेकर अधिकारी भी शामिल हैं। सरकारी पैसे का बंदरबांट हो रहा है। मनरेगा के मजदूरों की लिस्ट में गांव के ऐसे बहुत से लोगों का नाम शामिल किया गया है, जिनके हाथों में कभी फावड़ा न दिखा हो। इस गोरखधंधे में ब्लॉक सचिव से लेकर आडिट अधिकारी व बैंक कर्मी भी शामिल हैं। प्रधान मनरेगा के नाम पर अपने वोटरों के घर तक चकरोड व कच्ची सड़क बबनवाने से भी नहीं गुरेज करते। हैंडपंप, सोलर लाइट और शौचालय की रकम तो अपने पसंदीदा लोगों को ही अलॉट करवाते हैं। सरकारी जमीनों के आबंटन में तो माल ही माल है।

चुनाव के दौरान सूरा व मटन के साथ 500 गांधी छाप नोट का बोलबाला दिखता ही है और गांव वाले भी इसका खूब आनंद लेते हैं और ऐसे ही प्रत्याशी को वोट भी देने से नहीं हिचकते हैं। गांवों में प्रधानी चुनाव के दौरान यह भी देखने को मिलता है कि यदि आप भले व सुयोग्य प्रत्याशी हैं, लेकिन दारू व मटन खिलाने में पीछे रह गए तो आपको वोट नहीं मिलेगा।

 

ग्रामीणों को कौन समझाए कि चुनाव तक ही तुम्हारी यह सेवा होगी। चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशी तुम्हारे पैर तक पकड़ लेंगे। इतना ही नहीं रोयेंगे भी और घड़ियालू आंसू भी बहाएंगे। गांव को स्वर्ग बनाने का सपना दिखाएंगे। चुनाव जीतने पर सारे सपने जुमले हो जाएंगे, हवा हो जाएंगे।

ग्रामीणों पर भी तरस आता है कि क्या वे इतने साल में गांव के प्रत्याशी को परख नहीं पाए। यह ग्रामीणों से सवाल है। दोस्तों आप गांव प्रधानी में ऐसे प्रत्याशी को चुनें, जिसका चाल, चलन व विचार ठीक हो। नहीं तो आपको बाद में 5 साल तक पछताना ही पड़ेगा। अब अगली कड़ी में फिर इसी मुद्दे पर आपसे मिलेंगे।

 

धन्यवाद।


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