मोदी सरकार के ‘विश्वगुरु’ और हिंद महासागर में ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ होने के दावों की धज्जियां उड़ाते हुए अमेरिकी नौसेना ने भारत की समुद्री दहलीज पर एक दुस्साहसिक ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ को अंजाम दिया है।
विशाखापट्टनम में आयोजित ‘इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026’ में भारत के राजकीय अतिथि के रूप में शामिल होकर लौट रहे ईरानी युद्धपोत ‘IRIS Dena’ को श्रीलंका के पास अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी ने टॉरपीडो से उड़ा दिया। 87 ईरानी नौसैनिकों की जलसमाधि ने भारत की सामरिक संप्रभुता और मोदी सरकार की रक्षा नीति पर कड़े सवालिया निशान लगा दिए हैं।

यह हमला भारत की नाक के नीचे हुआ, जो सीधे तौर पर भाजपा सरकार की डिफेंस इंटेलिजेंस की विफलता को दर्शाता है। सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की समुद्री ताकत का बखान कर रहे थे, तब एक विदेशी परमाणु पनडुब्बी हमारे इतने करीब ‘किलिंग जोन’ कैसे बना ले गई? क्या हमारे अरबों रुपये के P-8I पोसाइडन निगरानी विमान और ‘सोनार’ नेटवर्क केवल परेड के लिए हैं? यदि भारत अपने निमंत्रण पर आए एक विदेशी युद्धपोत की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो ‘मैरीटाइम हब’ बनने के दावे खोखले नजर आते हैं।
कूटनीतिक रूप से यह घटना भारत के लिए किसी अपमान से कम नहीं है। अमेरिका ने भारत को भरोसे में लिए बिना इतनी बड़ी सैन्य कार्रवाई कर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह हिंद महासागर में भारत की क्षेत्रीय हैसियत को कितनी अहमियत देता है। एक तरफ सरकार ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिका हमारी संप्रभुता को ठेंगा दिखाकर हमारे मेहमान को हमारी ही सीमा के पास डुबो देता है। यह हमला केवल ईरान पर नहीं, बल्कि भारत की उस साख पर है जिसे बनाने में दशकों लगे हैं।
ईरान जैसे ऐतिहासिक मित्र के प्रति भारत की नैतिक जिम्मेदारी थी। इस ‘टॉरपीडो डिप्लोमेसी’ ने भारत को एक असहाय राष्ट्र की स्थिति में खड़ा कर दिया है। मोदी सरकार को अब देश को जवाब देना होगा कि क्या हिंद महासागर अब अमेरिकी नौसेना का नया अखाड़ा बन चुका है और क्या भारत की सुरक्षा एजेंसियां महज मूकदर्शक बनकर रह गई हैं?

