ताज़ा खबर
OtherPoliticsTop 10एजुकेशनटेकताज़ा खबरदुनियाभारतलाइफस्टाइलसंपादकीय

टैंक, जेट और बम से उठ रहा धरती का तापमान, युद्धों ने बढ़ाया जलवायु संकट

Share

सैन्य प्रदूषण से धरती पर तापमान 1.5°C की सीमा पर खतरा

✍🏻 डिजिटल डेस्क, मुंबई, नई दिल्ली | जब गोलियां चलती हैं, बम फोड़े जाते हैं, तो सिर्फ़ इंसान नहीं मरते, धरती भी जलने लगती है। ताज़ा अंतरराष्ट्रीय आंकड़े बता रहे हैं कि आज के युद्ध जलवायु संकट के सबसे खतरनाक स्रोत बन चुके हैं। धरती पर बढ़ते युद्ध अब केवल सीमाओं का विस्तार नहीं कर रहे। वे अब जलवायु परिवर्तन की दिशा भी तय कर रहे हैं। प्रदूषण, तापमान वृद्धि और पारिस्थितिक क्षरण, यह सब युद्ध की नई विरासत बन चुका है।

दुनिया के बढ़ते युद्ध अब केवल मानव जीवन के लिए नहीं, बल्कि पृथ्वी के पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा बन चुके हैं। युद्ध के मैदानों में बमबारी से केवल वायुमंडल ही नहीं, बल्कि धरती की मिट्टी और जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं।
ताज़ा अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, सैन्य गतिविधियों से होने वाला प्रदूषण अब वैश्विक जलवायु संकट को और भी तेज़ी से बढ़ा रहा है। युद्धों के दौरान टैंकों, जेट विमानों, युद्धपोतों और बमबारी से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें कई देशों के कुल वार्षिक उत्सर्जन से भी अधिक पाई गई हैं।

फोर्ब्स की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। वैश्विक स्तर पर युद्धों से उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों का अनुपात इतना ज़्यादा है कि यह उत्सर्जन अकेले ही कई मध्यम आकार के देशों की पूरी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा एक साल में किए गए कुल उत्सर्जन को पार कर जाता है।

बता दें कि दुनिया भर में मौजूदा समय में 59 सक्रिय सशस्त्र संघर्ष चल रहे हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे अधिक हैं। प्रमुख युद्ध यूक्रेन-रूस, इजराइल-हमास, सूडान, म्यांमार और यमन के बीच है। इसमें 100 से ज्यादा देश प्रभावित हो रहे हैं, जिसमें महाशक्तियां भी शामिल हैं। ये संघर्ष मानवीय और पर्यावरणीय क्षति पहुंचा रहे हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में विश्वभर में ऊर्जा-संबंधी CO₂ उत्सर्जन 37.8 गीगाटन तक पहुंच गया, जिसमें 5 से 10 प्रतिशत उत्सर्जन युद्धों और रक्षा गतिविधियों से आया। यह आंकड़ा इस बात का संकेत है कि शांति की कमी सीधे तौर पर धरती के तापमान में बढ़ोतरी का कारण बन रही है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की 2025 की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि धरती अब 1.5°C की अधिकतम तापमान वृद्धि सीमा को पार करने की कगार पर है। इस असामान्य वृद्धि के पीछे सैन्य प्रदूषण एक प्रमुख कारक के रूप में उभरा है।

रिपोर्ट में बताया गया कि नाटो (NATO) के विस्तार और सैन्य अभ्यासों से अकेले 1,320 मिलियन टन अतिरिक्त CO₂ उत्सर्जन की संभावना है, जो जर्मनी और कनाडा जैसे देशों के संयुक्त वार्षिक कार्बन उत्सर्जन के बराबर है।

युद्ध के मैदानों में बमबारी से केवल वायुमंडल ही नहीं, बल्कि धरती की मिट्टी और जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। गाजा और यूक्रेन में चल रहे संघर्षों के दौरान हुए रासायनिक विस्फोटों और भारी धातु के अवशेषों ने स्थानीय मिट्टी और जल प्रदूषण में 20 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की है। इससे वहां की कृषि भूमि लंबे समय तक अनुपजाऊ हो रही है और पीने के पानी के स्रोत विषैले तत्वों से भर रहे हैं।

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, इन युद्धों का असर महासागरों पर भी दिख रहा है। विस्फोटों से उत्पन्न सूक्ष्म धात्विक कण और तेल रिसाव समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कई इलाकों में मछलियों की प्रजातियां कम हो रही हैं और कोरल रीफ्स मरने की कगार पर हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्धों का यह क्रम नहीं थमा तो अगले दशक में वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के सारे अंतरराष्ट्रीय प्रयास विफल हो सकते हैं। पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए वैश्विक स्तर पर सैन्य कार्बन उत्सर्जन पर निगरानी और नियंत्रण की तत्काल आवश्यकता है।


Share

Related posts

एल्गार परिषद मामला: डीयू के प्रोफेसर को चार अगस्त तक एनआईए हिरासत में भेजा

samacharprahari

एयर इंडिया की दिल्ली-गोवा फ्लाइट में ‘आतंकवादी’, मचा हड़कंप

samacharprahari

रूस ने यूक्रेन में टीवी टावर को उड़ाया, 5 नागरिकों की मौत

Amit Kumar

उत्पीड़न और रिश्वत के आरोप में हिरासत में लिए बीजेपी विधायक

Prem Chand

पुणे में मोटरसाइकिल डीलर लापता

Prem Chand

मुंबई हमले के गुनहगार तहव्वुर राणा पर कसेगा भारत का शिकंजा

Prem Chand