✍🏻 आख़िर एक न्यू इंडिया की सरकार, जो हर मंच पर ‘विश्वगुरु’ की छवि गढ़ती है, वह इस बार चुप क्यों है? 15 से 17 जून तक कनाडा के अल्बर्टा में होने जा रहे G7 शिखर सम्मेलन के लिए भारत को अब तक कोई औपचारिक निमंत्रण नहीं भेजा गया है। नतीजा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बार इस उच्चस्तरीय मंच से अनुपस्थित रह सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो यह पिछले छह वर्षों में पहली बार होगा जब भारत इस वैश्विक मंच से अलग रहेगा।
मौजूदा हालात में सवाल सिर्फ आमंत्रण का नहीं, प्रतिष्ठा और परिपक्वता का है। एक तरफ दुनिया के मंचों पर ‘विश्वगुरु’ बनने की बातें हो रही हैं, दूसरी तरफ कूटनीतिक टेबल पर कुर्सी खाली रह जाने की आशंका है। क्या यह ‘सॉफ्ट पावर’ के उस दावे पर एक सख़्त कटाक्ष नहीं, जिसमें फोटो-ऑप और विदेशी दौरों को नीति से बड़ा माना गया?
भारत और कनाडा के रिश्तों में खटास 2023 में आई जब खालिस्तानी नेता हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर कनाडा ने भारत पर सीधे आरोप लगाए। इसके बाद से रिश्ते तल्ख़ ही रहे। अप्रैल 2025 में मार्क कार्नी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी कोई ठोस सुधार नहीं हुआ। भारत ने कनाडा से खालिस्तान समर्थक तत्वों पर कार्रवाई की मांग की, लेकिन जवाब सिर्फ ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ की दुहाई बनकर लौटा।
विदेश मंत्रालय का कहना है कि कनाडा की ओर से सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से नहीं लिया गया। लेकिन सवाल ये है कि क्या भारत ने भी अपनी रणनीति में ठोस पहल की? क्या कूटनीति केवल प्रतिक्रिया तक सीमित रह गई है?
G7 में अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन और कनाडा शामिल हैं। बीते वर्षों में भारत को विशेष आमंत्रण दिया जाता रहा, लेकिन इस बार सन्नाटा है। और वह भी तब, जब सरकार खुद को वैश्विक मंचों का अनिवार्य खिलाड़ी मानती है।
क्या यह चुप्पी रणनीति है, या फिर विदेश नीति की सबसे बड़ी चूक? जवाब आने बाकी है, पर संकेत स्पष्ट हैं।
