✍🏻 डिजिटल न्यूज़ डेस्क, मुंबई | महाराष्ट्र में बीएमसी समेत कई महानगरपालिकाओं और स्थानीय निकायों में लगातार बढ़ती बिनविरोध निर्वाचनों की संख्या ने चुनावी व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। नागरिकों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मतदान ही नहीं होता, तो मतदाता का NOTA का अधिकार आखिर कहां चला जाता है? इसका उत्तर भावनात्मक नहीं, बल्कि कानून की स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था में निहित है।
चुनाव प्रक्रिया तीन चरणों—नामांकन, नामांकन पत्रों की जांच और नाम वापसी—पर आधारित होती है। नाम वापसी की अंतिम तिथि के बाद यदि केवल एक ही वैध उम्मीदवार मैदान में बचता है, तो कानून मतदान कराने की अनुमति नहीं देता। ऐसे मामलों में चुनाव अधिकारी उस उम्मीदवार को बिनविरोध निर्वाचित घोषित करता है। यह व्यवस्था Representation of the People Act, 1951 के तहत अनिवार्य मानी गई है।
यहीं से NOTA को लेकर फैली भ्रांति साफ होती है। NOTA कोई स्वतंत्र या अलग अधिकार नहीं, बल्कि मतदान प्रक्रिया के भीतर उपलब्ध एक विकल्प है। जहां मतदान नहीं होता, वहां न तो ईवीएम खुलती है, न मतपत्र छपते हैं और न ही NOTA का कोई कानूनी अस्तित्व रहता है।
2013 में Supreme Court of India ने PUCL v. Union of India मामले में स्पष्ट किया था कि मतदान का अधिकार मौलिक नहीं, बल्कि वैधानिक है, और NOTA भी संसद द्वारा प्रदान की गई एक कानूनी सुविधा है।
फिलहाल, एकल उम्मीदवार की स्थिति में मतदान और NOTA का विकल्प देने की मांग को लेकर अदालतों में बहस जारी है और Election Commission of India से भी स्पष्टीकरण मांगा गया है। हालांकि जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, तब तक बिनविरोध चुनाव की मौजूदा प्रक्रिया पूरी तरह वैध बनी हुई है।
