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भारतीय श्रमिकों का संकट: विदेशी धरती पर पांच वर्षों में 37 हजार से अधिक मौतें

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✍️ प्रहरी संवाददाता, नई दिल्ली |  विदेशों में अपनी आजीविका तलाशने गए भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। राज्यसभा में सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों (2021-2025) में विदेशों में कुल 37,740 भारतीय श्रमिकों की मृत्यु हुई है। इसका औसत निकाला जाए तो हर दिन लगभग 20 से अधिक भारतीय कामगारों ने विदेशी जमीन पर अपनी जान गंवाई। विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने सदन को बताया कि इन मौतों में सबसे बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों का है, जहां कुल मौतों का लगभग 86 प्रतिशत मामला दर्ज किया गया।

आंकड़ों का विश्लेषण करें तो साल 2021 मौतों के मामले में सबसे भयावह रहा, जिसमें 8,234 श्रमिकों की मृत्यु हुई। हालांकि 2022 में यह संख्या गिरकर 6,614 हुई, लेकिन इसके बाद से ग्राफ में लगातार बढ़ोतरी देखी गई। 2025 तक आते-आते यह आंकड़ा फिर से 7,854 तक पहुंच गया।
खाड़ी देशों में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब सबसे अधिक प्रभावित रहे, जहां क्रमशः 12,380 और 11,757 भारतीयों की मौत हुई। इसके अलावा कुवैत, ओमान और कतर में भी मौतों की संख्या हजारों में है।

सिर्फ मौतों का आंकड़ा ही नहीं, बल्कि शोषण की शिकायतें भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। इस अवधि के दौरान भारतीय दूतावासों को कुल 80,985 शिकायतें प्राप्त हुईं। इन शिकायतों में वेतन न मिलना, पासपोर्ट जब्त कर लेना, अत्यधिक काम का दबाव और नियोक्ताओं द्वारा दुर्व्यवहार जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं। दिलचस्प बात यह है कि म्यांमा जैसे देशों में मौतों का आंकड़ा शून्य है, लेकिन वहां से मिलने वाली शिकायतों में अचानक भारी उछाल देखा गया है।

सरकार ने सदन को आश्वस्त किया है कि प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। विदेश राज्य मंत्री ने कहा कि संकट की स्थिति में भारतीय मिशन तुरंत स्थानीय अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाते हैं। इसके साथ ही, भारत ने कई देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते (MoU) भी किए हैं ताकि श्रम अधिकारों की रक्षा की जा सके और शोषण पर लगाम लगाई जा सके। हालांकि, बढ़ते आंकड़ों ने विदेश जाने वाले कामगारों की कार्यस्थितियों पर फिर से बहस छेड़ दी है।


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