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नमक, चीनी या फैट में से एक भी मानक टूटा तो पैकेट पर लगेगा लाल चेतावनी का निशान, पैकेज्ड फूड इंडस्ट्री की मनमानी पर सुप्रीम कोर्ट की फटकार का असर

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✍️ प्रहरी बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली | देश के 100 अरब डॉलर के पैकेटबंद खाद्य उद्योग की मनमानी और उपभोक्ता स्वास्थ्य से खिलवाड़ के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार करते हुए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग नियमों को कड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक अहम हलफनामे में नियामक ने स्पष्ट किया है कि अब किसी उत्पाद में नमक, चीनी या वसा (फैट) में से यदि कोई एक भी पोषक तत्व तय सीमा से अधिक पाया गया, तो पैकेट के मुख्य हिस्से पर लाल रंग का हेक्सागोनल चेतावनी चिन्ह अनिवार्य रूप से लगाना होगा। प्राधिकरण का यह सख्त कदम बहुराष्ट्रीय फूड कंपनियों और घरेलू कॉरपोरेट लॉबी के लिए करारा झटका माना जा रहा है, जो अब तक चेतावनी नियमों को लचीला और बेअसर बनाए रखने के लिए लगातार दबाव डाल रही थीं।

नियामक ने इससे पहले केवल उन्हीं उत्पादों पर लाल चेतावनी लेबल लगाने का प्रस्ताव रखा था, जिनमें कम से कम दो हानिकारक तत्व एक साथ तय सीमा को पार करते थे। इस पुराने फॉर्मूले को स्वास्थ्य विशेषज्ञों, उपभोक्ता अधिकार कार्यकर्ताओं और मेडिकल संगठनों ने उद्योग-समर्थक और जनविरोधी करार दिया था। मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्राधिकरण के इस ढुलमुल और लचर रवैये पर तल्ख टिप्पणियां की थीं। शीर्ष अदालत की सख्ती और जनस्वास्थ्य से जुड़े राष्ट्रीय आक्रोश के बाद एफएसएसएआई ने अपनी नीति बदलते हुए ‘सिंगल-फेज’ व्यवस्था लागू करने का हलफनामा दिया, जिसके तहत किसी भी एक तत्व के सीमा लांघने पर संबंधित पोषक तत्व के नाम के साथ फ्रंट पर लाल चेतावनी दर्ज करनी होगी।

इसके साथ ही कृत्रिम मिठास (आर्टिफिशियल स्वीटनर्स) वाले पेय और खाद्य पदार्थों पर भी शिकंजा कसा गया है। नए प्रावधानों के अनुसार अब कंपनियों को पैकेट के पिछले हिस्से में बारीक अक्षरों में जानकारी छिपाने की इजाजत नहीं होगी, बल्कि फ्रंट पैनल पर स्पष्ट रूप से “कंटेन नॉन-कैलोरिक स्वीटनर” लिखना अनिवार्य होगा। प्राधिकरण ने अदालत को सूचित किया है कि अगले चार महीनों के भीतर इन नियमों को अंतिम रूप देकर अधिसूचित कर दिया जाएगा, जिसके बाद उद्योग को इन कड़े मानकों को पूरी तरह लागू करने के लिए 365 दिनों की समय-सीमा दी जाएगी।

यह नियामकीय बदलाव ऐसे समय में आया है जब देश भर में घटिया खाद्य मानकों, मिलावट और अस्वास्थ्यकर खानपान के खिलाफ राष्ट्रव्यापी जांच अभियान चल रहा है। भारत का खाद्य बाजार नेस्ले, यूनिलीवर, मोंडेलेज, पेप्सिको और कोका-कोला जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियों के लिए दुनिया के सबसे बड़े मुनाफा कमाने वाले केंद्रों में से एक है। ये कंपनियां यूरोपीय देशों में स्वेच्छा से कड़े चेतावनी लेबल लगाती हैं, लेकिन भारत में ऐसी पहलों का विरोध करती रही हैं।

उद्योग संगठनों ने शीर्ष अदालत में दलील दी है कि चिप्स, कोला और पारंपरिक मिठाइयों पर लाल निशान लगने से भारतीय खाद्य उत्पादों की वैश्विक साख बिगड़ेगी। इसके विपरीत, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि पैकेट के सामने दिखने वाला यह स्पष्ट लाल निशान देश में तेजी से बढ़ती जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों, मधुमेह और मोटापे पर लगाम लगाने में सबसे निर्णायक हथियार साबित होगा।

 


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