✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | देश में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) बूम, नए डेटा सेंटर्स और डिजिटल क्रांति के कारण बिजली की मांग इस समय ऐतिहासिक स्तर पर है। इस भारी डिमांड को पूरा करने के लिए भारत सरकार क्लीन एनर्जी (स्वच्छ ऊर्जा) प्रोजेक्ट्स को रिकॉर्ड रफ्तार से हरी झंडी दिखा रही है। लेकिन इस पूरी कवायद के बीच भारतीय बाजारों से बेहद चौंकाने वाली जमीनी हकीकत सामने आ रही है। सरकार के तमाम प्रयासों, ‘मेक इन इंडिया’ के नारों और चीनी सौर उपकरणों पर थोपी गई भारी-भरकम ‘बेसिक कस्टम्स ड्यूटी’ (BCD) के बावजूद, भारतीय क्लीन एनर्जी सेक्टर में चीनी कंपोनेंट्स का आयात थमने का नाम नहीं ले रहा है, बल्कि चीनी माल लगातार पैर पसारते हुए भारतीय घरेलू बाजार को अपनी गिरफ्त में ले चुका है।
इस ट्रेंड ने केंद्र सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी ‘उत्पादन आधारित प्रोत्साहन’ (PLI) योजना की प्रभावशीलता और सफलता पर बहुत गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वाणिज्य मंत्रालय और आधिकारिक ट्रेड डेटा के अनुसार, चीन से होने वाले कुल व्यापारिक आयात में 16.03% की भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे चीन $126.96 अरब (USD 126.96 Billion) के साथ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है।
अरबों रुपये के आवंटन के बाद भी पीएलआई योजना घरेलू स्तर पर ऐसी मजबूत सप्लाई चेन खड़ी करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है, जो चीनी आयात पर भारत की निर्भरता को कम कर सके। नतीजा यह है कि भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा रिकॉर्ड -$106 अरब डॉलर के पार चला गया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे भू-राजनीतिक संकट, विशेषकर ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट बंद हो गया है। इसके बंद होने से वैश्विक तेल और गैस बाजारों में भारी उथल-पुथल मची है, जिससे आयात पर निर्भर देश गहरे संकट में आ गए हैं। लेकिन चीन के लिए यह संकट एक ‘गोल्डन चांस’ साबित हुआ है। तेल और गैस की अनिश्चितता ने भारत सहित दुनिया भर के देशों को क्लीन एनर्जी की तरफ भागने पर मजबूर कर दिया है। देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए चीन से रिकॉर्ड मात्रा में सोलर पैनल और बैटरी पैक खरीद रहे हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ ऊर्जा एजेंडे और कड़े रुख के बावजूद, हालिया कस्टम डेटा बताते हैं कि चीन से अमेरिका को होने वाले सोलर सेल्स निर्यात में 346% ($39.96 मिलियन) और लिथियम-आयन बैटरी में 20.8% ($780 मिलियन) का भारी उछाल आया है। ग्लोबल साउथ के गरीब देशों से लेकर दुनिया के सबसे अमीर देशों तक, चीनी क्लीन एनर्जी कंपोनेंट्स का निर्यात तेजी से बढ़ रहा है, जो भारत के लिए एक बड़ी खतरे की घंटी है।
वाणिज्य मंत्रालय के नवीनतम आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि चीनी उपकरणों की ‘स्केल ऑफ इकोनॉमी’ (बड़ी मात्रा में उत्पादन) इतनी ज्यादा है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स और डेवलपर्स के लिए भारी कस्टम्स ड्यूटी चुकाने के बाद भी चीनी माल खरीदना, घरेलू सामान के मुकाबले कहीं ज्यादा किफायती और व्यावहारिक बना हुआ है। भारतीय सोलर प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल होने वाले सेल्स (Photovoltaic Cells) का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी चीन से आयात हो रहा है।
पीएलआई योजना के तहत घरेलू स्तर पर सोलर वेफर्स और सेल्स का उत्पादन शुरू कराने के दावे जमीन पर सुस्त साबित हुए हैं, जिसके कारण इलेक्ट्रिकल एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरण सेक्टर में $47.67 अरब का आयात दर्ज किया गया है और इसमें सालाना 13% तक की वृद्धि देखी जा रही है।
यही हाल बैटरी स्टोरेज और ईवी कंपोनेंट्स का है , जहां भारत में ईवी क्रांति और बड़े पावर ग्रिड्स को संभालने के लिए बैटरी स्टोरेज की मांग में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हो रही है। लेकिन घरेलू स्तर पर लिथियम-आयन सेल्स का निर्माण न होने के कारण इसका सीधा फायदा चीनी सप्लायर्स उठा रहे हैं, जिससे गाड़ियां और ऑटो पार्ट्स सेक्टर का आयात $2.07 अरब पर पहुँच गया है। इसके अलावा, देश में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन (जैसे मोबाइल असेंबलिंग) बढ़ने के कारण भी चीन से कंपोनेंट्स का आयात 40.2% तक बढ़ा है।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की संरक्षणवादी नीतियां और प्रोत्साहन योजनाएं मिलकर भी चीनी उत्पादों के मूल्य और पैमाने का मुकाबला करने में पस्त नजर आ रही हैं। वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में चीन से होने वाला मासिक आयात औसतन $12 अरब प्रति माह के रिकॉर्ड स्तर को छू रहा है। जब तक पीएलआई योजना के तहत वास्तविक और बड़े पैमाने पर कोर-मैन्युफैक्चरिंग जमीन पर नहीं उतरती, तब तक भारत का क्लीन एनर्जी बूम आत्मनिर्भर होने के बजाय पूरी तरह चीनी आयात के भरोसे ही आगे बढ़ता रहेगा।
