@ समाचार प्रहरी रिपोर्ट |
नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने शिवसेना में फूट संबंधित मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि वह उद्धव ठाकरे सरकार की बहाली का आदेश नहीं दे सकती, क्योंकि उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना ही इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, बेंच ने माना कि फ्लोर टेस्ट के लिए राज्यपाल का फैसला और व्हिप नियुक्त करने का स्पीकर का फैसला दोनों गलत थे।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एम.आर. शाह, जस्टिस कृष्ण मुरारी, जस्टिस हेमा कोहली और जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की संविधान पीठ ने 14 फरवरी 2023 को मामले की सुनवाई शुरू की थी। कोर्ट ने 16 मार्च 2023 को फैसला सुरक्षित रख लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शिंदे समूह समर्थित गोगावाले को शिवसेना के व्हिप के रूप में नियुक्त करने का स्पीकर का निर्णय अवैध था। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि विधायकों का कर्तव्य कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराना है। संविधान के अनुच्छेद 212 का अर्थ यह नहीं है कि सदन की सभी प्रक्रियात्मक दुर्बलताएं न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर हैं।
पीठ ने कहा, ‘विधायकों का समूह राजनीतिक दल से अलग हो सकता है। अध्यक्ष ने यह पहचानने का प्रयास नहीं किया कि दो व्यक्तियों – सुनील प्रभु या भरत गोगावाले में से कौन सा राजनीतिक दल का अधिकृत सचेतक था। अध्यक्ष को केवल राजनीतिक दल की ओर से नियुक्त सचेतक को ही मान्यता देनी चाहिए। कोई गुट या समूह अयोग्यता की कार्यवाही के बचाव में यह तर्क नहीं दे सकता कि उन्होंने मूल पार्टी का गठन किया था।
अदालत ने कहा कि अगर स्पीकर और सरकार अविश्वास प्रस्ताव को दरकिनार करते हैं, तब राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के बिना फ्लोर टेस्ट के लिए बुला सकते थे। विपक्षी दलों ने कोई अविश्वास प्रस्ताव जारी नहीं किया। राज्यपाल के पास सरकार के विश्वास पर संदेह करने के लिए कोई वस्तुनिष्ठ सामग्री नहीं थी। भले ही मान लिया जाए कि विधायक सरकार से बाहर निकलना चाहते थे, लेकिन उन्होंने केवल एक गुट का गठन किया था।
पीठ ने कहा, ‘न तो संविधान और न ही कानून राज्यपाल को राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने और इंटर-पार्टी या इंट्रा-पार्टी विवादों में भूमिका निभाने का अधिकार देता है। राज्यपाल से पत्राचार में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि असंतुष्ट विधायक सरकार से समर्थन वापस लेना चाहते थे। राज्यपाल ने शिवसेना के विधायकों के एक गुट के प्रस्ताव पर भरोसा करके निष्कर्ष निकाला कि उद्धव ठाकरे ने विधायकों के बहुमत का समर्थन खो दिया है। यह एक बाहरी विचार था, जिस पर राज्यपाल ने भरोसा किया। राज्यपाल को पत्र पर भरोसा नहीं करना चाहिए था। पत्र यह संकेत नहीं दे रहा था कि कि उद्धव ठाकरे ने समर्थन खो दिया।’ राज्यपाल ने सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के समर्थन से एकनाथ शिंदे को शपथ दिलाई।’

