आरटीआई कुचलने वाले अफसरों पर सीधे एफआईआर और न्यायिक जांच की उठी मांग
एक क्लिक पर दस्तावेज उपलब्ध होने वाला बीजेपी सरकार का दावा खोखला
✍️ प्रहरी संवाददाता मुंबई | देश की वित्तीय राजधानी मुंबई के अति-महत्वपूर्ण इलाके पवई (तीरंदाज) में 14.5 एकड़ के बेशकीमती भूखंड पर खुलेआम कब्जा जमाने के लिए कॉरपोरेट, पुलिस और नौकरशाही के नापाक सिंडिकेट का एक ऐसा सनसनीखेज खेल सामने आया है, जिसने खुद को ‘मिस्टर क्लीन’ और ‘मोस्ट एक्टिव’ मुख्यमंत्री का तमगा देने वाले देवेंद्र फडणवीस और उनकी सरकार की निष्पक्षता को सीधे तौर पर तार-तार कर दिया है।


जमीन पर अवैध कब्जे की साजिश रचने वाले रियल एस्टेट कारोबारी निरंजन हीरानंदानी के इशारे पर सिटी सिविल कोर्ट (कोर्ट रूम 66) में 2006 से लंबित दीवानी मुकदमे को कथित तौर पर भारी घूसखोरी और प्रतिवादियों के वकीलों की मिलीभगत से रातों-रात गुपचुप तरीके से वापस ले लिया गया।
हद तो तब हो गई जब शिकायतकर्ता की आवाज दबाने और उसे डराने-धमकाने के लिए बिल्डर के दबाव में पवई पुलिस द्वारा एक झूठी शिकायत तक दर्ज कर ली गई, जिसकी जांच आज तक कहां पहुंची और उसमें क्या निकला, इस पर पुलिस प्रशासन पूरी तरह रहस्यमयी चुप्पी साधे बैठा है, जबकि शिकायतकर्ता कई बार संबंधित पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगने का नाकाम प्रयास भी कर चुका है।
इस दीवानी मुकदमे में शिकायतकर्ता के पिता मुख्य प्रतिवादी थे, जिनकी 2021 में मृत्यु हो गई। पिता के निधन के बाद से शिकायतकर्ता लगातार नगर भूमापन अधिकारी (CTSO), मुलुंड तहसीलदार और बीएमसी से इस केस से जुड़े कागजात व राजस्व दस्तावेज हासिल करने की कोशिश में जुटा हुआ है, लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों का सिंडिकेट सक्रिय होकर पिछले पांच वर्षों से इस जमीन के मूल राजस्व रिकॉर्ड्स और आरटीआई अर्जियों को सुनियोजित तरीके से दबाने का आपराधिक खेल खेल रहा है।
प्रशासनिक मिलीभगत और अफसरों के संदेहास्पद आचरण की पोल तब खुली, जब शिकायतकर्ता ने 4 सितंबर 2026 को सीधे मंत्रालय स्थित नगर विकास विभाग से जमीन के मूल दस्तावेज और स्वीकृतियों का ब्योरा मांगा। जन सूचना अधिकारी गीतेश नारलाबार ने बीस दिनों तक फाइल दबाए रखने के बाद 23 सितंबर को पत्र क्रमांक RTI-2026/Online-918/UD-21 के जरिए बेशर्मी से पल्ला झाड़ते हुए कह दिया कि उनके पास कोई रिकॉर्ड नहीं है और गेंद बीएमसी के पाले में सरका दी।
इसके बाद बीएमसी मुख्यालय में बैठी जन सूचना अधिकारी एवं प्रशासनिक अधिकारी (आयुक्त) नीलम एन. पाडलकर ने मंत्रालय से आए पत्र पर कार्रवाई करने के बजाय 30 सितंबर 2026 को पत्र संख्या एमआईआर/2777 जारी कर आवेदक को विक्रोली स्थित उप प्रमुख अभियंता (डीपी, पूर्व उपनगर) के दफ्तर में धकेल दिया, जिसकी प्रति डाक द्वारा 13 अक्टूबर 2026 को शिकायतकर्ता को प्राप्त हुई।
डिजिटल इंडिया और जीरो टॉलरेंस के सरकारी दावों को चिढ़ाता यह पूरा घटनाक्रम कोई साधारण प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि अरबों रुपये के लैंड ग्रैब को अंजाम देने के लिए सबूत नष्ट करने और आवेदक को कानूनी प्रक्रिया से थकाने की सोची-समझी आपराधिक साजिश है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की नाक के नीचे पुलिस का दुरुपयोग कर फर्जी शिकायतें दर्ज कराने, कोर्ट से संदिग्ध तरीके से केस वापस कराने और आरटीआई अर्जियों को फुटबॉल बनाकर रिकॉर्ड्स नष्ट करने वाले नगर विकास विभाग के गीतेश नारलाबार, बीएमसी की नीलम पाडलकर, मुलुंड तहसीलदार, नगर भूमापन अधिकारी और पवई पुलिस के दोषी अधिकारियों के खिलाफ पद के दुरुपयोग, साक्ष्य छिपाने और भू-माफिया को खुला संरक्षण देने के संगीन आरोपों में तत्काल प्रभाव से निलंबन, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर और उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की मांग ने अब पूरी तरह तूल पकड़ लिया है।
