FTA नेटवर्क के विस्तार से नए बाजारों में बढ़ेगी पहुंच
निर्यात, विदेशी निवेश और उत्पादकता को मिल सकती है रफ्तार, लेकिन विनिर्माण क्षमता बढ़ाना निर्णायक
✍️प्रहरी संवाददाता, मुंबई | अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति दुनिया के व्यापारिक समीकरण बदल रही है। अमेरिका में बढ़ते आयात शुल्क के बीच जब वैश्विक अर्थव्यवस्थाएं नए बाजार और भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार तलाश रही हैं, तब भारत अपने मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का दायरा तेजी से बढ़ाकर इस बदलाव को आर्थिक अवसर में बदलने की तैयारी में है। विश्व व्यापार संगठन (WTO) के वैश्विक अर्थव्यवस्था मॉडल पर आधारित आकलन के मुताबिक, भारत के व्यापार समझौते 2035 तक देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में करीब 140 अरब डॉलर का अतिरिक्त इजाफा कर सकते हैं। यह संभावित लाभ भारत की अर्थव्यवस्था के लिए आधार स्थिति की तुलना में लगभग 1.7% की अतिरिक्त बढ़ोतरी के बराबर है।
विश्व व्यापार संगठन के इस आकलन का आधार भारत का तेजी से विस्तृत होता व्यापार नेटवर्क है। यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA), ब्रिटेन और ओमान के साथ समझौते लागू होने के साथ भारत ने ऑस्ट्रेलिया और संयुक्त अरब अमीरात के साथ पहले से मौजूद व्यापारिक संबंधों को भी विस्तार दिया है। न्यूजीलैंड के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर और यूरोपीय संघ के साथ वार्ता पूरी होने से भारतीय कारोबार के लिए नए बाजारों तक पहुंच की संभावनाएं बढ़ी हैं। भारत यूरेशियन आर्थिक संघ और खाड़ी सहयोग परिषद सहित अन्य साझेदारों के साथ भी व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अमेरिकी टैरिफ 2.3% से बढ़कर 10.7%
वैश्विक व्यापार में इस बदलाव की प्रमुख वजह अमेरिकी शुल्क नीति है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका की औसत टैरिफ दर 2024 के 2.3% से बढ़कर अगस्त 2026 में 10.7% हो गई। इस बढ़ोतरी से अमेरिकी बाजार में सामान बेचने की लागत बढ़ी है और वैश्विक कंपनियों के सामने अपने उत्पादन तथा आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की जरूरत तेज हुई है। अनुमान है कि इस स्तर के टैरिफ से अमेरिकी वस्तु आयात पिछले शुल्क ढांचे की तुलना में करीब 15% घट सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत को भी अमेरिकी शुल्क नीति के उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा है। 2025 की दूसरी छमाही में भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क बढ़ाए गए थे। फरवरी 2026 में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने से संबंधित 25% अतिरिक्त शुल्क हटा दिया और भारत पर पारस्परिक टैरिफ दर 18% कर दी। इसके बाद भी क्षेत्र-विशेष के शुल्क लागू हैं और दोनों देशों के बीच व्यापक व्यापार समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा।
अवसर बड़ा, लेकिन लाभ अपने आप नहीं मिलेगा
भारत के लिए नए व्यापार समझौते केवल निर्यात बढ़ाने का माध्यम नहीं हैं। आयात लागत में संभावित कमी, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में वृद्धि और घरेलू उद्योगों की उत्पादकता में सुधार भी इनके अहम आर्थिक लाभ हो सकते हैं। लेकिन समझौतों से बाजार खुलना और उन बाजारों में भारतीय कंपनियों की बिक्री बढ़ना दो अलग बातें हैं।
140 अरब डॉलर के संभावित लाभ को वास्तविक आर्थिक वृद्धि में बदलने के लिए भारत को विनिर्माण प्रतिस्पर्धा मजबूत करनी होगी, निवेश आकर्षित करना होगा और उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी। कृषि क्षेत्र में कम उत्पादक रोजगार से श्रमिकों को विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में स्थानांतरित करने के लिए प्रभावी नीतियां भी अतिरिक्त लाभ का रास्ता खोल सकती हैं।
वैश्विक व्यापार की बदलती दिशा भारत को अवसर दे रही है, लेकिन इस अवसर का आकार इस बात से तय होगा कि भारतीय उद्योग नए बाजारों में कितनी तेजी से अपनी हिस्सेदारी बढ़ा पाते हैं।
