क्या लोकतंत्र में सत्ता यह तय करेगी कि जनता कहाँ बोलेगी और कितनी धीमी आवाज़ में बोलेगी? जन्तर-मन्तर को अधिसूचित प्रदर्शन स्थलों से बाहर करना इसी सवाल का जवाब है। यह फैसला प्रशासनिक नहीं, राजनीतिक षड्यंत्र है।
क्यों चुभता है जन्तर-मन्तर?
क्योंकि यह सत्ता के कान के पास है। पिछले दो साल में एसआईआर विरोध, महंगाई और बेरोज़गारी के खिलाफ हर बड़ा जमावड़ा यहीं हुआ। सरकार को दर्पण दिखाने वाली जगह को ही हटाओ, तो दर्पण टूटेगा नहीं, सत्ता का चेहरा छिपेगा।
विकल्प या निर्वासन?
रामलीला मैदान अभी रामलीला के लिए आरक्षित है। बुराड़ी और सीबीडी मैदान दिल्ली के छोर पर हैं। यह प्रदर्शन की अनुमति नहीं, प्रदर्शन का देश निकाला है।
दुनिया का कोई लोकतंत्र अपनी राजधानी में विरोध को शहर से बाहर नहीं धकेलता। लंदन का हाइड पार्क, वाशिंगटन का व्हाइट हाउस लॉन, सब सत्ता के सामने हैं। लोकतंत्र तभी ज़िंदा है जब शासक को जनता की आहट सुनाई दे।
मताधिकार के बाद अब विरोध का अधिकार निशाने पर !
पहले लाखों लोगों के वोट पर सवाल उठे, अब उनके बोलने की जगह छीनी जा रही है। यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। आज जन्तर-मन्तर गया, कल प्रेस क्लब जाएगा, परसों सोशल मीडिया जाएगा। चुप्पी की कीमत दासता है।
क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 19?
संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है। 2018 में खुद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रामलीला मैदान जैसे स्थान प्रदर्शन के लिए ज़रूरी हैं क्योंकि “सत्ता को जनता की आवाज़ सुननी ही होगी”।
लेकिन आज उसी कोर्ट की चुप्पी के बीच भाजपा सरकार ने जन्तर-मन्तर छीन लिया।
सवाल है: जब कानून बनाने वाला और कानून बचाने वाला दोनों एक तरफ हो जाएं, तो नागरिक किसके पास जाए?
संगठनों की अग्निपरीक्षा
सीजेपी या कोई भी संगठन अगर केवल बयान देकर दिल्ली पुलिस की तय जगह पर चला जाता है, तो वह आंदोलन नहीं, समझौता करेगा।
इतिहास ने सिखाया है कि अधिकारों की रक्षा सविनय अवज्ञा से होती है, याचना से नहीं। भगत सिंह ने असेम्बली में बम फेंकने से पहले अनुमति नहीं मांगी थी।
दिल्ली, फैसला तुम्हारे हाथ में है
1919 में रौलेट एक्ट के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर जो भीड़ उतरी थी, उसने अंग्रेज़ों को हिला दिया था। 2026 में दिल्ली को फिर तय करना है।
क्या वह सत्ता के फरमान को सिर झुकाकर मानेगी, या जन्तर-मन्तर को फिर से जनता का मन्तर बनाएगी?
जन्तर-मन्तर पत्थरों का ढेर नहीं है। वह दिल्ली के दिल की धड़कन है। धड़कन रोक दी जाए तो शरीर ज़िंदा नहीं रहता, लोकतंत्र भी नहीं।
